शुक्रवार, अप्रैल 09, 2010

अपने लड्डू का भाव तुम बताओ ............


बिना कोई भूमिका बांधे आज आप सभी को एक वाकया सुनाती हूँ !
 मेरी एक कजन सिस्टर है जिसकी शादी के लिए  कुछ रिश्ते देखे जा रहे है अर्थार्त कुछ लड़के देखे जा रहे है, अरेंज मेरिज में  पूरा प्रोसेस कैसे चलता  है, ये  तो आप सभी जानते होंगे !  पहले कुंडलिया मिलाई जाती है और वो मिल जाये तो लड़का देखा जाता है और अगर लड़का पसंद आ जाये तो लड़की दिखाई जाती है और दोनों एक दूसरे को पसंद आ जाये तो शहनाई बज जाती है !
अब कल ही की बात है मेरी सिस्टर के लिए उसके पापा और उनका एक दोस्त और एक अन्य रिश्तेदार लड़के को देखने उसके घर गए ! साथ में एक अन्य व्यक्ति भी था जिसका विवरण मैं बाद मे दूंगी ! ये सभी लड़के के घर पहुंचे, सभी को बैठाया गया उनके सामने बढ़िया सा नाश्ता और ठंडा सर्व किया गया !  बातो का सिलसिला शुरू हुआ, लड़की के पिता ने  किसी व्यक्ति का नाम लेकर लड़के के पिता से उनकी जान पहचान के बारे कुछ जानना चाहा तो लड़के के पिता ने जवाब दिया की "भाईसाहब, हमे तो पूरी कालोनी के लोग जानते है अब हम किस-किस का नाम याद रखे !" लड़की के पिता को उनका ये जवाब थोडा पसंद नहीं आया ! अब लड़के की माता जी की बारी आई उन्होंने पूछा की "आपकी लड़की ने किस सब्जेक्ट में ग्रेजुएशन पूरी की है" लड़की के पिता ने जवाब दे दिया ! तभी अगला सवाल पूछा गया और ये भी माता जी की तरफ से  था " किस मीडियम से पदाई पूरी की है, इंग्लिश या हिंदी और उसकी परसेंटेज क्या थी ?" इस पर लड़की के पिता ने जवाब देने से पहले अपनी एक दुविधा दूर करनी चाही उन्होंने माताजी से पूछा की " पदाई किस मीडियम से की है और मार्क्स क्या है आप,ये  क्यों पूछ रही  है  ?" तो माताजी ने जवाब दिया की " वो क्या है ना की मैंने खुद एम्.ए. किया हुआ है, तो इसलिए अपनी बहूँ भी मैं अच्छी पड़ी लिखी ही चाहती हूँ १" उसके बाद लड़की के पिता ने अपनी लड़की की पदाई का झटपट ब्यौरा दे दिया !
अब बात करते है उस चोथे व्यक्ति की जो इन तीन लोगो के साथ गए थे दरअसल वो इस रिश्ते के "मध्यकार' थे मतलब देसी भाषा में कहे तो 'बिचोलिया" ! जिनका, रिश्ता तय हो जाने पर दो परसेंट कमीशन दोनों तरफ से लेना पहले से तय था ! अब बोलने की बारी इनकी आई इन्होने लड़के के माता-पिता से कहा की "आपको जो भी लेन-देन की बात करनी है वो आमने-सामने कर लो  !"(भई सही भी है जो कुछ भी चाहिए पहले ही बता दो बाद में बेटी को परेशान करने से तो यही बेहतर है !) इस पर लड़की के पिता ने ही पूछा की "हाँ,  आप बताइये  की आप क्या  चाहते है" उनकी इस बात पर लड़के की माताजी ने हँसते हुए कहा  की "ये तो आप बताइए की आप कितना लगायेंगे ?" अब फिर लड़की के पिता ने बोला  की "ये मैं कैसे बताऊँ, ये तो आप ही बताओगे की आप कितना लगवाना चाहते हो"  इस पर लड़के की माताजी ने बहुत ही सटीक जवाब दिया की, " भाईसाहब, लड़के वालो क्या है, उनका  पेट तो कभी भरता ही नहीं, तो हम क्या बताये आप ही बताइए " ( ये वो वाक्य  था जो लगभग हर लड़की वाला लड़के वालो के पीठ पीछे कहता है, लेकिन यहाँ तो माताजी ने बड़े ही सीधे तौर पर कह दिया ! मुझे ये जवाब पसंद आया ! इतना साफ बोलने वाले लोग बहुत कम ही होते है ! ) लेकिन उनका ये जवाब उनके विचारो के बारे में बहुत कुछ ब्यान कर गया !  (उनके इस जवाब ने लड़की के पिता के मस्तिष्क में रिश्ते की नामंजूरी की बहुत गहरी मोहर लगा दी !) और माताजी के प्रश्न के उत्तर में लड़की के पिता ने एक उधारण देते हुए कहा की " मैं मिठाई का व्यपारी हूँ, और अगर कोई मेरी दुकान पर आएगा और मुझसे लड्डू का भाव पूछेगा तो उसका भाव तो मैं ही बताऊंगा ना,  अब ग्राहक तो लड्डू का भाव तय करेगा नहीं" (वैसे मुझे ये उधारण भी बहुत सटीक  लगा, अब सही भी  है लड्डू लेकर तो माता जी बैठी है इसलिए अपने लड्डू का भाव तो उन्हें ही बताना पड़ेगा ! ) तो इस पर माताजी तपाक से बोली " भई, ये सब बिजनिस-विसनिस, ये सोदेबजी  मैं तो जानती नहीं ! (लेकिन,उनकी बातो से ऐसा लग तो नहीं रहा  था !) इस पर  लड़की के पिता बोले "सही कहा आपने इसमें आपकी गलती नहीं है आपके कोई बेटी नहीं है ना इसलिए आप ऐसा कह रही है !" (दरअसल माता जी के सिर्फ चार बेटे है !) अब माता जी फिर बोली "नहीं, ऐसी बात नहीं है, मेरे बेटी नहीं है तो क्या हुआ मेरे जेठ जी के और मेरे घर में कई और रिश्तेदारों के तो बेटिया है  हमने देखी है उनकी शादी !" इस पर लड़की के पिता ने कहा "रिश्तेदारों से मतलब नहीं है आपकी  अपनी कोई बेटी होती तब आपको पता चलता !" ( अब इस तरह की गर्म बहस वहाँ बैठे सभी लोगो को ये बताने के लिए काफी थी की आगाज़ अगर ऐसा है तो अंजाम क्या होगा !) अब मुझे यह बताने की ज़रूरत तो नहीं की इस बातचीत का अंजाम क्या हुआ होगा !
वैसे इन माता जी जैसे ना जाने कितने ही ऐसे लोग है जो रोज़ अपने-अपने लड्दुओ का भाव तय करते होंगे ! वैसे  मेरे घर में भी एक लड्डू है जब मैंने उसकी कीमत जाननी चाही तो मुझे जवाब मिला की हमारा लड्डू बिकाऊ नहीं है, अब इस पर कुछ लोगो का यही कहना होता है की हाँ, सही है जिसके खुद के बेटी होती है सिर्फ वो ही ऐसा सोच पाते है ! शायद ये बात सही भी है, तो इसका मतलब क्या अब हर घर में एक बेटी ज़रूर होनी चाहिए ???  लड़की के पिता ने जो बात कही उससे तो यही लगता है !
लेकिन अब ये बात पूरी तरह से समझ आ गई की लोग लड़की पैदा ना होने की दुआ क्यों करते है, क्योकि यही वो  एक  वजह है जो लडकियों के  जन्म लेने से पहले ही उन्हें मारने के लिए मजबूर करती है यही वो वजह है जो कन्या ब्रूड हत्या में इजाफा कर रही है,  और आज तो ये भ्रम भी पूरी तरह टूट गया की शिक्षित होना, किसी भी कुप्रथा  और रुदिवादी परम्परा को तोड़ने के लिए काफी है क्योकि वो लड़का स्वयं  एक विद्यालय में, एक शिक्षक के पद पर कार्यरत है ! वो बच्चो को तो शायद यही पदाता होगा की दहेज लेना एक जुर्म है, लेकिन वो खुद को इस जुर्म को करने से नहीं रोक पाया !
कब होगा इस कुप्रथा का अंत ??? कब इन दहेज के लोभियों से लडकिया आजाद होंगी, और कब उनका इस संसार में आना किसी के लिए दर्द नहीं होगा ???? आखिर कब होगा ये एक स्वस्थ सपना साकार ???

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