सोमवार, दिसंबर 11, 2017

जिंदगी की राजनीति !

1.बीती गर्मियों की बात है मेरे छोटे बेटे को बीमारी की वजह से एक प्राइवेट हॉस्पिटल में 10 दिन के लिए एडमिट होना पड़ा था जिसमे से 3 दिन वो आईसीयू में रहा था ! जब 10 दिन बाद सुबह उसे डिस्चार्ज किया तो हॉस्पिटल ने बिल दिया 78 हज़ार का, बिल 78 हज़ार का इसलिए था क्योंकि बेटे का मेडिक्लेम करवाया हुआ था ! हॉस्पिटल ने बिल मेडिक्लेम कम्पनी में
भेजा और हमें कहा आप एजेंट को बता दीजिए ताकि वो जल्द इसे पास करवाये और फिर आपको डिस्चार्ज मिल जाएगा !
हमने एजेंट से बात की उन्होंने थोड़ी देर बाद बताया कि कंपनी ने क्वेरी डाली है कि हॉस्पिटल ने लूज मोशन जैसी बीमारी में इतने लंबे टाइम के लिए पेशेंट को क्यों रखा और आईसीयू से डिस्चार्ज होने के बाद भी 5 दिन हॉस्पिटल में रोके रखने की क्या जरूरत थी ??? खैर, हॉस्पिटल ने दोबारा दूसरा बिल तैयार किया और भेजा अब बिल गया 73 हज़ार का , मेडिकल कंपनी ने ये भी पास नही  किया उसने नई क्वेरी लगाई की हॉस्पिटल ने जो टैस्ट करवाये है उनकी जरूरत क्यों पड़ी और इसका जवाब उन्होंने सीनियर डॉक्टर्स से लिखित में माँगा उसके बाद तीसरी बार बिल गया 70 हज़ार का जिसे मेडिकल कंपनी ने फाइनली 68 हज़ार का पास किया !
अब हॉस्पीटल वालों ने हमे 4 हज़ार का बिल अलग से दिया और बोले ये आपको भरना पड़ेगा क्योंकि आईसीयू में जो अक्यूपमेंट्स इस्तेमाल हुए है वो मेडिकल के अंडर नहीं आते इसलिए ये बिल आप भरो हमने एजेंट को पूछा उन्होंने कहा हाँ होता तो लेकिन इतनी देर से जब बिल जा रहे थे ये तब क्यों नहीं बोले ?? बिल पास होने में सुबह से रात हो चुकी थी तो हमने भी ज्यादा बहस ना करके 4 हज़ार भर दिए !
TPA पेपर्स साइन करने के लिए जब मैं गयी तब मैंने वहाँ बैठी लेडी से पूछा मैडम अगर यही बिल आप कैश में देते तो बिल कितने का होता पहले तो उसने मुस्कुरा कर टाल दिया फिर जब मैंने दोबारा पूछा तो बोली मैडम अगर ये बिल कैश पेमेंट से होता तो ये डेढ़ लाख से ऊपर जाता !
अब दूसरी कहानी
2. मेरे परिवार की ही एक लेडी जिन्हें कुछ साल पहले रसोली हो गयी थी और जिसका उन्होंने एक प्राइवेट हॉस्पिटल में ऑपरेशन करवाया जिसमें ऑपरेशन के बाद उनका यूटरस निकाल दिया गया अब ऑपरेशन के तकरीबन एक साल बाद उन्हें फिर से दर्द शुरू हुआ उन्होंने उसी गायनोक्लोजिस्ट को दोबारा दिखाया डॉक्टर ने कुछ दिन ट्रीटमेंट किया जब फर्क नही पड़ा तो उन्हें अल्ट्रासाउंड कराने को बोला तो उस लेडी ने एक प्राइवेट हॉस्पिटल में अल्ट्रासाउंड करवाया जिसकी रिपार्ट  उन्हें शाम को मिली जब रिपोर्ट लेजाकर उन्होंने गायनोक्लोजिस्ट को दिखाई तो डॉक्टर हैरान , डॉक्टर ने खुद उसी समय हॉस्पिटल में फ़ोन करके पूछा कि रिपोर्ट किसकी दी  है हॉस्पिटल स्टाफ ने कन्फर्म किया कि रिपोर्ट उन्ही लेडी की है ! दरअसल रिपोर्ट में ये था कि लेडी को दर्द यूटरस में सूजन की वजह से हो रहा है जबकि यूटरस तो था ही नही ! लेडी ने कंज्यूमर कोर्ट में केस फाइल किया हुआ है और ये केस फाइल होने के बाद हॉस्पिटल ने उस लेडी को केस वापस लेने के लिए एक अच्छा खासा अमाउंट आफर किया  जो उन्होंने लेने से मना कर दिया केस 1 साल से कंज्यूमर कोर्ट में है !
अब तीसरी कहानी
3. 2 साल पहले मेरे जेठ यानी मेरे पति के बड़े भाई को अचानक पीठ और कंधों में दर्द शुरू होने लगा उन्होंने पेन रिलीफ जेल लगा लिया है और शॉप पर ही काम करने वाले लड़के से ही अपने कंधे दबवाने लगे लेकिन उन्हें आराम नही  मिला और वो घर आ कर लेट गए जब काफी देर बाद भी कोई आराम नहीं मिला और उन्हें बेचैनी और सांस लेने में दिक्कत होने लगी तो उन्हें पास ही के प्राइवेट हॉस्पिटल में ले गए जहाँ ड्यूटी डॉक्टर्स ने चेक करने के बाद पेन रिलीफ इंजेक्शन लगा दिए और कहा कि थोड़ी देर बाद आराम आ जायेगा आप इन्हें ले जा सकते है लेकिन उन्हें फिर भी आराम नही आया तो डॉक्टर्स ने एक ट्राई लेते हुए कहा कि आप इनका एक ECG करवा लेना अगर ये ज्यादा परेशान  हो तो तब मेरे फादर इन लॉ ने कहा अगर जरूरत है तो आप ही क्यों नही  कर देते वैसे भी इन्हें अभी तक आराम नही मिल रहा ! डॉक्टर्स ने पापा के कहने पर उनका ECG किया और जब उसकी रिपोर्ट आई तो सबके होश उड़ गए ! दरअसल वो मामूली दर्द नहीं एक मेजर हार्ट अटैक था ! और रिपोर्ट के अनुसार उनके पास बचने के 30% चांस थे ! हर कोशिश की हर कॉन्टेक्ट यूज़ किया लेकिन कोई उन्हें नहीं बचा सका ! आज भी याद है जब उन्हें घर लाया गया तो उनकी बेटियों ने हमसे चिपक कर रोकर रोकर बारबार यही पूछा चाची पापा कहाँ गए चाची पापा को क्या हुआ पापा कुछ बोल क्यों नहीं रहे ! हमारे पास उस वक़्त सिवाय आंसुओ के और कुछ नहीं था !! 😔😔😔
अब बात आती है दिल्ली के शालीमार बाग के  मैक्स हॉस्पिटल की जिसका लाइसेंस सस्पेंड किया गया है तबसे कुछ लोग ऐसे हाय तौबा मचा रहे है कि जैसे हॉस्पिटल ही बन्द हो गया हो ! भई सिर्फ़ नए पेशेंट को एडमिट करना बंद हुआ है जो पहले से एडमिट है उनका इलाज अब भी चल रहा है और वैसे कौन सा ऐसा समझदार होगा जो उस हॉस्पिटल में इलाज कराना चाहेगा जहां जिंदा बच्चे को मरा बता कर उसे पैक करके दे दें !!  एक बार जरा उस बच्चे के माँ बाप से पूछना उन्हें कैसा लगा !!?? वैसे भी  जिस आम जनता की परेशानी की बात आप कर रहे हो वो आम जनता उसका बिल भी नहीं भर पाती !! एक मामूली सी बीमारी का भी ये हॉस्पिटल 2 या 3 दिन का बिल भी 1 लाख से नीचे नहीं बनाते ! इन हॉस्पिटल्स में बिना मेडिक्लेम के जाने के बारे में बन्दा सोचता भी नहीं है और अगर जाना भी पड़े तो भई रिसेप्शन वाले पहले आपसे आपकी हैसियत पूछते है उसके बाद आपको एडमिट करते है !
तो हर चीज़ में अपनी गंदी राजनीति मत घुसेड़ो, ज़रूरी नहीं कि समर्थन और विरोध की राजनीति हर बार ज़रूरी हो ! अगर इस एक फैसले से बाकी हॉस्पिटल्स को भी अक्ल आये तो ये सभी के लिए अच्छा ही होगा !
बाकी जिस पर बीतती है असल दर्द वही जानता है !

बुधवार, अगस्त 16, 2017

उसकी कहानी (अंतिम भाग)

नंदिनी की मौत को लगभग एक महीना बीत चुका था और इस दौरान उसके परिवार में काफी उथल-पुथल मच चुकी थी !
रातों को घर से गायब रहने वाला शशांक, आज गाड़ियां चोरी करने के जुर्म में जेल में था और विवेक भी कुछ अनचाही बीमारियों की वजह से अक्सर बीमार रहने लगा था !  इस सब के चलते पुरषोत्तम अपने काम से वोलेंट्री रिटायरमेंट ले चुका था ! शायद शारीरिक थकान से ज्यादा मानसिक थकान पुरषोत्तम पर हावी होने लगी थी उधर नंदिनी की माँ भी अब लगभग सारा वक़्त या तो अपने कमरे मे बन्द रह कर रोती रहती या फिर पुरषोत्तम की जिद पर उसके साथ कॉलोनी के पार्क में जाकर गुमसुम सी बैठ जाती ! अब दिन बस यूँही बीत रहे थे ! अब कब दिन हुआ कब रात ढली किसी को इससे मतलब ही नहीं था, अब सबकी दुनिया बस वो चारदीवारी ही थी !
पुरषोत्तम आज भी जब-जब नंदिनी को याद करता उसे रह-रह अपनी गलती का अहसास होता , उसने क्यों बात नहीं की नंदिनी से ? वो क्यों उसे उसके हिस्से का समय नहीं दे पाया ? क्यों वो सिर्फ़ उसके सभी खर्चे पूरे करने को ही अपनी जिम्मेदारी समझ बैठा ?????.........एक रात ऐसे ही सवालो में खोए हुए वो फिर से नंदिनी का लिखा वो आख़िरी कागज़ अपनी अलमारी से निकालता है और एक बार फिर उसे पढ़ने बैठ जाता है !!..............
हेलो पापा, कैसे है आप ?
पापा मैं आपकी नंदिनी, आपकी वही छोटी सी गुड़िया जिसे आप बचपन मे अपने कंधों पर बैठा कर घुमाते थे.....और जब आप थक जाते थे तो मैं फिर से रोने लगती थी और आप मुझे फिर से पूरे घर मे घुमाते थे .....और आपको याद है पापा, एक बार मम्मा ने बताया था कि जब आप मेरी उँगली पकड़ कर चलना सीखा रहे थे तब आपसे मेरा हाथ अचानक छूट गया था और मैं गिर गयी थी तब छोटी सी खरोंच आई थी मेरे हाथ और घुटने पर .....थोड़ा सा ख़ून भी निकल गया था.....तब मैं बहुत रोई थी और ये देख कर आप भी रो पड़े थे तब आपको देख कर मम्मा बहुत हँसी थी !!! और फिर उस दिन आप मेरी वजह से ऑफिस भी नहीं गए थे !!
आपको याद है पापा, शशांक और विवेक के आने के बाद जब भी हम तीनों में कभी झगड़ा होता, तो आप हमेशा मेरी ही साइड लेते थे और मम्मा तब बहुत गुस्सा करती थी और शशांक और विवेक भी रो पड़ते थे .....और ये सब देख कर मुझे बड़ा मजा आता था
और हाँ, पापा आपको वो बात याद है जब 9th क्लास में मेरा एक लड़के से झगड़ा हो गया था तब आपने उसे उसके घर जाकर भी डाँट लगाई थी .....और पापा, याद है मैं जब भी शाम को अगर शशांक के साथ कहीं जाती तो आप हमेशा शशांक को  मेरा ध्यान रखने को कहते जबकि मैं हर बार कहती कि ये तो मुझसे छोटा है !!!
लेकिन पापा जब आपने मुझे आगे की पढ़ाई के लिए जिस दिन हॉस्टल भेजा था ना उस दिन मैं आपको याद करके रात भर रोई थी, हालाँकि मैं बड़ी हो चुकी थी लेकिन पापा आप ही कहते थे ना कि बच्चे हमेशा बच्चे होते है और शायद मैं उस वक़्त मैं बड़ी होने की जगह बच्ची बन गयी थी .....पापा मुझे यहाँ हमेशा आपकी याद आती थी क्योंकि यहाँ जब मैं रात में अकेले जागती थी ना तो आप मेरे साथ बातें करने के लिए नहीं होते थे और जब भी मेरा किसी से झगड़ा होता तो आप उसको डाँटने के लिए भी नहीं होते थे .......शायद मुझे आपकी आदत हो चुकी थी और वो आदत जा ही नहीं रही थी .......मैं जब भी आपसे फ़ोन पर बात करने की कोशिश करती आप हमेशा बिज़ी होते थे और मैं फिर अकेली हो जाती ......शायद इसी वजह से मैं नशा करना सीख गई और मुझे याद है जब आपको ये पता लगा था तो आपको बहुत गुस्सा आया था और फिर धीरे -धीरे आपने मुझसे बात करना बंद कर दिया !!!!
फिर बस मम्मा के थ्रु ही बात होती .....पापा मैं वापस आप सबके पास आना चाहती थी मुझे नहीं पढ़ना था आगे !! मैं ये सब भी छोड़ना चाहती थी लेकिन शायद मैं इस नशे के दलदल में फँस चुँकि थी पापा सच में मैंने बहुत कोशिश की इस सबसे बाहर निकलने की लेकिन जब भी मैं ऐसा करती मुझे मैं फिर से अकेली लगती ......हर बार कोशिश करती और हर बार हार जाती लेकिन आज मै थक गई पापा ....अब और कोशिशें नहीं होती इसलिए आज जा रही हूँ आप सबसे दूर ....मुझे माफ़ करना पापा मैं आपकी फ़िर से वो प्यारी बेटी नही बन पाई .......!!!!
आपकी नंदिनी .....

शुक्रवार, जुलाई 28, 2017

उसकी कहानी (भाग-4 )

वो घबराई हुयी सी घर में चिल्लाते हुए पुरषोत्तम को उठाती है !
उठो जल्दी उठो नंदिनी के हॉस्टल से फ़ोन आया है उन्होंने अभी बुलाया है !
क्यों, क्या हुआ ??
(रोते हुए बोली ) नंदिनी हॉस्पिटल में है, उसने स्यूसाइड करने की कोशिश की है !
क्या ???
शोर सुन कर शशांक और विवेक भी अपने कमरे से बाहर आ जाते है ! दोनों को जब पता चलता है तो वो नंदिनी का हाल जान्ने के लिए उसे फ़ोन करते है लेकिन फ़ोन लगातार ऑफ आता है !
कुछ देर बाद ही चारो नंदिनी के हॉस्टल के लिए निकल जाते है ! रास्तेभर नंदिनी की माँ रोते हुए पुरषोत्तम को एक ही बात कहती रही कि आपने नंदिनी से बात क्यों नहीं की, वो कुछ बोलना चाह रही थी........  लेकिन आज पुरषोत्तम के पास इन बातों का कोई जवाब नहीं था ! वो लगातार बस यही सोच रहा था कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो नंदिनी ने स्यूसाइड जैसा रास्ता चुना और क्यों मैंने उससे बात नहीं की ! मैं क्यों थोड़ा सा टाइम नहीं निकाल पाया ??
इसी सब उधेड़बुन में शशांक का फ़ोन बार-बार बजता रहा सभी को लगता कि शयद नंदिनी की कोई खबर हो लेकिन नहीं वो फ़ोन हर बार शशांक के लिए ही होते !!
कुछ घंटो के सफर के बाद वो सभी अब नंदिनी के कॉलेज पहुंच चुके थे और वहाँ से वो कुछ कॉलेज टीचर्स के साथ हॉस्पिटल पहुँच गए !
नंदिनी की माँ लगातार रोये तेओ हुए डॉक्टर से नंदिनी का हाल पूछा डॉक्टर कुछ नहीं बोले !
तभी कुछ पुलिसकर्मी वहाँ आये और उन्होंने पुरषोत्तम से पूछा ....
 क्या आप नंदिनी के फादर है ?
हाँ, मैं ही नंदिनी का फॉदर हूँ कहाँ है नंदिनी कैसी है वो ???
जब आपको फ़ोन किया था तभी नंदिनी को यहाँ लाये थे लेकिन उनकी हालत ठीक नहीं थी
मतलब ??
सर डॉक्टर्स ने काफी कोशिश  की लेकिन सॉरी वो उसे बचा नहीं पाए !
पुरषोत्तम ये सुन वहीँ फर्श पर निढाल हो जाता है वो ना रो पाता है और ना ही कुछ कह पाता है !!
अब शायद उसे भी ये पछतावा है कि वो अपनी बेटी की बात नहीं सुन सका, वो किस परेशानी से गुजर रही थी,
वो क्या चाह रही था, क्यों वो उसे कुछ मिनट नहीं दे पाया ??
तभी वहाँ एक पुलिसकर्मी आता है और पुरषोत्तम के हाथ एक कागज देता है !
ये आपकी बेटी के बैग से मिला था आपके लिए लिखा है !
पुरषोत्तम वो कागज़ खोल कर देखता है  और अपनी जेब में रख लेता है !
......................................................................................................
 to be continued ........



शनिवार, जुलाई 15, 2017

उसकी कहानी (भाग -3 )

शाम 7 बजे
अच्छा विवेक अब मैं जाती हूँ वैसे भी बहुत देर हो गयी !
सोनल, थोड़ी देर और रुको ना वैसे भी मम्मा अभी नहीं आएँगी वो जब भी पार्टी जाती है तो देर से ही आती है !(सोनल, विवेक की ही सोसायटी में रहती है !)
और अंकल ??
अरे यार पापा तो आते ही लेट है !
और शशांक भईया ??
अरे आज वो भी अपने फ्रेंड्स के साथ बाहर गए है पता नहीं कब आएंगे !
ओके, लेकिन मेरी मम्मा आने वाली होंगी ना, इसलिए उनके घर पहुँचने से पहले मुझे जाना होगा !
ओह्ह,,, ठीक है लेकिन नेक्स्ट कब आओगी ???
जब तुम फ्री हो !! (हँसते हुए )
ओके चलो बाय !
सोनल को बाहर तक छोड़ने जाता है फिर वापस आकर दरवाजा बंद करके टीवी के सामने बैठ जाता है ! थोड़ी देर बाद डोर बेल बजती है ! विवेक दरवाजा खोलता है ! सामने उसकी मम्मा थी !
अरे आप आ गए !
हाँ, आज थोड़ा देर तक चली पार्टी ! मेड काम कर गयी ??
नहीं, आयी नहीं आज वो !!
तूने मुझे फोन करके क्यों नहीं बताया ??और शशांक कहाँ है घर में नहीं है वो ??
अरे मैं आज सो गया था और भईया भी आपके जाने के बाद ही चले गए थे !
कहाँ गया वो ??
पता नहीं कुछ फ्रेंड्स आये थे उनके, उन्ही के साथ गए !
ठीक है !! अच्छा सुन आज खाना बाहर से ही आर्डर कर ले सबके लिए , मैं बहुत थक गयी हूँ !!
ठीक है !!
और  शशांक को भी फोन करके पूछ ले कब तक आयेगा ??
ओके मम्मा !!
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रात करीब 9 बजे......
डोर बेल बजी !
उसने दरवाजा खोला, देखा शशांक खड़ा था
अरे, कहाँ था तू ??
अरे वो दोस्त के घर गया  था कुछ काम था !!
क्या काम था ??
कुछ ख़ास नहीं बस वैसे ही कुछ था !
पता नहीं समझ नहीं आते तेरे काम भी !
अच्छा खाना क्या बना है !
आज बाहर से मंगाया है !!
अरे यार परसो भी बाहर से मंगाया था !! क्या मम्मा, बनाया क्यों नहीं कुछ !!
मैं बस थक गयी थी, आज खा ले कल बना दूंगी !!
इसी बीच पुरुषोत्तम भी आता है और सभी खाना खाकर सो जाते है !
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रात करीब 2 बजे शशांक का फोन बजता है !
उधर से आवाज आती है
कहाँ है शशांक आया नहीं अभी तक !
हाँ बस 15 मिनट में आ रहा हूँ तू मेरा गेट पर ही वेट कर  !
ठीक है मैं यही खड़ा हूँ तू जल्दी आ !
शशांक चुप-चाप घर के बाहर चला जाता है !!!
.......
अरे यार कितनी देर लगाता है तू !!
हाँ, अब आ गया ना, अच्छा सामान लाया है ना तू !!
हाँ, लाया हूँ अब चल जल्दी कर !
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शशांक करीब साढ़े तीन बजे घर वापस आता है वो दूसरी चाबी से गेट खोलता है और वापस अपने कमरे में जाकर सो जाता है !
तभी घर का लैंडलाईन फोन बजता है !! शशांक घबरा जाता है !!
फोन शशांक की मम्मा उठाती है ! फोन नंदिनी के हॉस्टल से है !!
नंदिनी के पेरेंट्स को फ़ौरन हॉस्टल में बुलाया गया है !!
to be continued .........

गुरुवार, जुलाई 06, 2017

उसकी कहानी (भाग २ )

नंदिनी जल्दी उठ यार  क्लास शुरू होने वाली है !
शैला, प्लीज़ सोने दे ! सर बहुत दर्द कर रहा है ! (शैला नंदिनी की रूम मेट है )
मैडम क्लास शुरू होने  में २० मिनट है उठ जा वरना आज भी क्लास मिस हो जाएगी !
प्लीज़ यार सोने दे ना !
और वैसे तू सारी रात थी कहाँ ?? और  ये हाथ पर क्या हुआ ये किस चीज़ का निशान है ??
(नंदिनी अपना हाथ खींचते हुए )कुछ नहीं है तू जा , मैं आती हूँ अभी थोड़ी देर में
लेकिन ये है किस चीज़ का निशान ये तो बता !!
कहा ना कुछ नहीं, तू जा मैं रेडी होकर आती हूँ !
नंदिनी ये निशान सिरिंज का  है ना ??
तू जा ना मैं आती हूँ !
नंदिनी, कहाँ थी तू रात को ??
फ्रेंड के साथ पार्टी में थी !!
कौन से फ्रेंड ??
तू नहीं जानती उनको और तू जा अब मैं आ जाउंगी !
ओके बाय !!
बाय !!
(अपना फोन निकाल कर नंबर डायल करती है  ) हेलो मम्मा, पापा कहाँ है ??
वो तो ऑफिस गए आज जल्दी जाना था उन्हें !!
ओके !!
बोलो क्या काम था पैसे चाहिए क्या ??
नहीं रहने दो है मेरे पास !
हम्म्म, तू क्लास में नहीं है !
हाँ, बस जा रही हूँ पापा आये तो बता देना !!
वो आजकल देर से ही आ रहे है ऑफिस में काम थोड़ा ज्यादा है !! कुछ काम है  तो मुझे बता !!
नहीं कुछ नहीं !!
चल ठीक है मुझे वैसे भी अभी सोसायटी की पार्टी में जाना है मैं बाद में बात करती हूँ !
हम्म्म्म !!
कुछ चाहिए तो बता दे !
नहीं कुछ नहीं ! चलो बाय !
बाय !!
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विवेक , बेटा मैं जा रही हूँ खाना बना दिया है दोनों खा लेना  !
हाँ ठीक है ! कब तक आओगे ?
5 -6 बजे तक आउंगी !
ओके बाय मम्मा !
बाय और भाई को भी उठा देना !
हाँ ठीक है मम्मा !
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थोड़ी देर बाद डोर बेल बजी विवेक ने दरवाजा खोला तो कुछ लड़के लड़किया खड़े थे बाहर, उन्होंने शशांक को बुलाने को कहा विवेक शशांक को बुला लाया !
विवेक मम्मा कहाँ है ??? (बाहर से ही पूछता है )
किसी पार्टी में गयी है शाम तक आएँगी !
चल ठीक है मैं जरा बाहर जा रहा हूँ थोड़ी देर में आ जाऊंगा !
कहाँ जा रहे हो ??
जा रहा हूँ अभी थोड़ी देर में आ जाऊंगा !
भाई खाना तो खा लो !
मैं बाहर ही खा लूंगा तू खा ले चल बाय !
हम्म्म, बाय !!
to be continued .............

शुक्रवार, जून 30, 2017

उसकी कहानी ( भाग -1 )

अभी बस वो काम ख़त्म करके आरामकुर्सी पर बैठी ही थी कि उसकी आँख लग गयी अचानक डोर बेल बजने पर उसकी नींद टूटी घड़ी की तरफ नजर गयी तो देखा रात के10 बज चुके थे तभी दोबारा बेल बजी इस बार वो फुर्ती से दरवाज़े की तरफ गयी दरवाज़ा खोला तो सामने पुरुषोत्तम खड़े थे !
लगभग गुस्से भरे स्वर में बोले कब से बेल बजा रहा हूँ क्या कर रही थी ???
बस ज़रा आँख लग गई थी , तुम बैठो मैं पानी लाती हूँ !!
पानी रहने दो सीधा खाना लगा दो बहुत भूख लगी है !!
हाँ, ठीक है लगाती हूँ !
खाना लगाते हुए .....आज बहुत देर कर दी आने में बच्चें भी इंतजार करके सो गए !!
हाँ, आज ऑफिस में काम थोड़ा ज्यादा आ गया था ! बच्चों ने तो खाना खा लिया ना ???
हाँ, तुम्हारा इंतजार करते करते खा लिया फिर टीवी देखते देखते सो गए !!
नंदिनी का फ़ोन आया ??
(नंदिनी, पुरुषोत्तम की सबसे बड़ी बेटी है और अभी वो हॉस्टल में रह रही है )
हाँ आया था , थोड़ी परेशान थी
क्यों ????
हॉस्टल में उसके साथ के कुछ बच्चों से उसका झगड़ा हो गया !!
इस बार पुरुषोत्तम फिर गुस्से से बोला , ये लड़की वहाँ पढ़ने गयी है या सबसे लड़ने ?? रोज रोज का तमाशा बना लिया है इसने ....नहीं होती पढ़ाई लिखाई तो कह दो घर वापस आ जाये !!
अरे , आप सुन तो लो एक बार कि हुआ क्या है !!!
नहीं सुनना मुझे कुछ रोज़ का तमाशा है इस लड़की का !!!
अरे, लेकिन एक बार ......
(बीच मे बात काटते हुए) आज तुम विवेक और शशांक की PTM में स्कूल जाने वाली थी ना क्या हुआ ??
हाँ, गयी थी विवेक तो ठीक है स्कूल में, लेकिन शशांक की थोड़ी कम्प्लेन आई है !!
(थाली सरकाते हुए गुस्से से ) पता नहीं इन दोनों की शिकायतें आना कब बंद  होंगी थक गया हूँ इनकी रोज रोज की  सुनते सुनते !!तुम करती क्या हो सारा दिन ध्यान क्यों नहीं रखती इन दोनों का  ???
नंदिनी आपसे बात करना चाह रही थी
कह दो उससे पैसे खत्म हो गए है तो तुम्हें बता दे मैं भेज दूंगा
नहीँ, वो शायद कुछ कहना चाह रही थी
(खाने की टेबल से उठते हुए) मैं सोने जा रहा हूँ सुबह जल्दी उठा देना कल सुबह ऑफिस में मीटिंग है , गुड नाईट !!
गुड नाईट !!!
to be continued .....

रविवार, मार्च 09, 2014

क्यों जन्म दिया ??

मेरे घर से कुछ दूरी पर एक तीनमंजिला मकान बना हुआ हैं जिसमे एक-एक मंज़िल पर कई कई किरायदार रहते है उनमे से ही एक परिवार ऐसा है जिसमे आठ सदस्य है ! माता पिता,चार बेटियां और दो बेटे ! बेटियां बड़ी हैं और दोनों बेटे छोटे ! अक्सर इनमे से सबसे छोटा बेटा जिसकी उम्र तकरीबन आठ या नौ वर्ष की होगी वो अक्सर हमारे घर खेलने आ जाया करता है पहले आने में हिचकिचाता था लेकिन धीरे धीरे वो खुल गया और मेरे बेटे को भी (जिसकी उम्र दो वर्ष है ) उसके साथ खेलना अच्छा लगने लगा ! अब दोनों शाम को अक्सर साथ खेला करते हैं ! मैं भी अक्सर उनके खेल में शामिल हो जाया करती हूँ इसी दौरान मैं उससे कुछ बातें भी कर लिया करती हूँ और बातों बातों में ही पता चला कि वो आठ सदस्यो का परिवार किस तरह रहता है! हुआ यूँ कि एक दिन जब खेलते खेलते बाहर अन्धेरा नज़र आया तब मेरी नज़र घडी पर गयी देखा तो नौ बज चुके थे, मैंने फ़ौरन उसे उसके घर जाने को कहा, "कहा कि बहुत देर हो गयी है अब तुम अपने घर जाओ तुम्हारी मम्मी चिंता कर रही होंगी " "इस पर वो हँसते हुए बोला कि नहीं मेरी मम्मी कुछ नही कहती" मुझे सुन कर हैरानी हुई ! मैंने फिर पूछा क्यों, तुम्हे देर से जाने पर डाँट नहीं पड़ती ?वो बोला "नहीं बल्कि उसकी मम्मी तो सो चुकी होंगी !" ये बात सुन कर हैरानी और बढ़ गयी सोचने लगी कि कैसी माँ है बच्चा घर से बाहर खेल रहा है और वो सो भी गयी !लेकिन उसके बाद जब मैंने उससे इस सब कि वजह पूछी तो जो बात सामने आयी उससे बड़ी हैरानी भी हुई और तरस भी आया !

असल में उस बच्चे की माँ घरो में झाड़ू पौछे का काम किया करती है और उसके पिता बेलदारी का काम करते है लेकिन फिलहाल वो घर में ही रहते है और उस बच्चे के कहे अनुसार उसके पिता रोज़ शराब पी कर घर में झगड़ा करते है और उस बच्चे को भी अक्सर मारा पीटा करते है जिस वजह से वो बच्चा अक्सर देर रात को ही अपने घर जाना पसंद करता है ! उसके बाद उसने बताया कि उसकी मम्मी रोज़ सुबह घर के सभी सदस्यो के लिए खाना बना कर और बाकी काम ख़त्म करके तक़रीबन छह बजे काम के लिए निकल जाया करती है और साथ उसकी बहने भी घरो में काम करने जाती है ! सबसे बड़ी बहन के बारे में उसने बताया कि उसकी शादी हो चुकी है और वो भी घरो में काम किया करती है और एक बहन किसी के घर में रहती है और वही रेह कर काम करती है !फिर मैंने पूछा और तुम दोनों भाई क्या करते हो तो वो तपाक से बोला मेरा भाई मोबाईल की दूकान पर काम करता है (जिसकी उम्र उसे पता नहीं बस इतना पता है कि वो आठवी क्लास में पढता है) और उसे पाँचसौ रुपए महीना मिलता है, और मैं यहाँ आ जाता हूँ ! ये सब सुन कर सच में एक बार तो बड़ा गुस्सा आया कि कैसे माँ बाप है जो अपने बच्चो से इतनी छोटी उम्र में काम करवा रहे है और जिन्हे अपने बच्चो की बिलकुल फ़िक्र ही नहीं कि वो सारा दिन कैसे रहते है कहाँ जाते है क्या करते है ?



अक्सर जब किसी बच्चे को इस तरह के हालात में देखती हूँ तो यही एक सवाल मन में उठता है कि आखिर क्यूँ इसके माँ बाप ने इसे पैदा किया जब वो इसे सही ढंग से पाल ही नहीं सकते तो क्यूँ इस बेचारे की ज़िंदगी इतनी बत्तर बना दी ? ये सवाल मैं अक्सर जब किसी माता पिता से पूछती थी तो जवाब मिलता था "अरे बेटा ये किसी के हाथ में नहीं होता ऊपरवाले ने इनकी किस्मत में यही लिखा है तो कोई क्या करें, कौन से माँ बाप चाहते है कि उनका बच्चा भूखा रहे और पढ़ लिख न सके !" उनकी इस बात पर मैं अक्सर यही सोचती अरे किस्मत उपरवाले ने लिखी है लेकिन किस्मत लिखवाने के लिए ऊपरवाले के पास पैदा करके तो माँ बाप ने ही भेजा है !लेकिन इस सबके बीच एक और बात भी सामने आती और वो ये कि बहुत से लोग सिर्फ एक लड़के के माता पिता कहलाने के चक्कर में इतने बच्चे पैदा कर लिया करते है ! अगर इस बात पर गौर करा जाए तो जिस परिवार का ज़िक्र मैंने किया है उसमे भी चारो बेटियां बड़ी ही है और बेटे छोटे, तो ये माना जा सकता है कि शायद उस माँ ने भी एक अदद बेटे की चाह में इतने बच्चो को जन्म दिया हो !



उफ्फ्फ !! मतलब फिर वही सब, घर में एक बेटा होना चाहिए बड़ा होकर जो माँ बाप का सहारा बनेगा कुल का नाम आगे बढ़ाएगा वगैरह वगैहरा !! अब बेटा होना चाहिए या नहीं होना चाहिए मैं इस विषय पर बात नहीं करना चाहती, हाँ लेकिन मैं एक सवाल उन सभी माता पिता से ज़रूर पूछना चाहूंगी जिन्होंने बेटे कि चाह में कई बच्चे पैदा किये है, क्या वो अपने सभी बच्चो को भरपूर पालन पोषण कर रहे है ?? इसे कुछ यूँ समझते है अभी मैंने ऊपर जिस लड़के की बात की मैं यहाँ भी उसी का उधाहरण देते हुए कहूँगी मैं जब भी उससे कुछ खाने के लिए पूछती तो वो झट से हाँ कह देता और जो भी मैं उसे देती वो बिना स्वाद लिए झट से खा लेता है धीरे धीरे वो रात का खाना भी मेरे बेटे के साथ ही खा कर जाने लगा और मैं भी बड़े शौक से दोनों को खाना खिला देती लेकिन धीरे धीरे मुझे अहसास हुआ कि वो खाना खाने के बाद फ़ौरन ही अपने घर चला जाता था लगा जैसे वो सिर्फ खाना बनने के इंतज़ार में है इतिफाक कि बात है कि अगले ही दिन मुझे खाना बनाने में थोड़ी देर हो गयी और मेरा बेटा भी दूध पी कर सो चुका था तो बचपन मैंने भी उसे जाने के लिए कह दिया लेकिन उस दिन उसका जाने का मन नहीं हुआ असल में वो खाने के इंतज़ार में था तभी मैंने उससे पूछा कि तुम्हारी मम्मी ने क्या बनाया है उसने कहा "पानी वाले आलू" और साथ में ये भी कहा कि उसे वो अच्छे नहीं लगते ! मैंने कहा ठीक है थोड़ी देर रुको फिर यहीं खाना खा जाना और उस दिन के बाद से वो अक्सर रात का खाना मेरे घर पर ही खा कर जाने लगा इस दौरान मैंन जब भी उससे पूछा कि तुम्हारे घर पर क्या बना है तो उसके जवाब में अक्सर पानी वाले आलू ही हुआ करते थे ! अब कोई ये समझाए कि प्रतिदिन आलू कि सब्ज़ी और रोटी खिला देने भर को सम्पूर्ण पोषण कहा जा सकता है ?



अब तक मैंने एक ख़ास वर्ग कि ही बात की लेकिन ये बात सभी पर लागू होती जब हम अपनी कमाई से इतने बच्चो का पालन नहीं कर सकते इन्हे भरपेट भोजन नहीं से सकते, इन्हे अच्छी शिक्षा नहीं दे सकते, तो क्यों इन्हे पैदा करते है ?? क्यों इन्हे बचपन में ही कमाई करने के लिए मजबूर कर देते है ?? क्यों इनका बचपन नरक बना देते है ?? जिस बेटे के लिए इतने बच्चे पैदा किये जाते है क्या उस बेटे की ही आधारभूत ज़रूरत पूरी हो पाती है ??और जिस बेटे को पाने के चक्कर में इतने बच्चे पैदा किये क्या उनकी ज़रूरते हम पूरी कर पाते है ?? क्यों हम अपने ही बच्चो को पिछड़ा और पिछड़ा बनाते चले जाते है, क्यों हम इस सोच से ऊपर नहीं उठ पाते कि बच्चा चाहे जो भी हो लड़का या लड़की हमे उसे हर स्तर पर आगे बढ़ाना है उसकी आधारभूत ज़रुरतो को पूरा करना है !! क्यों हम ना चाहते हुए भी, या सिर्फ एक लड़के की चाह में एक के बाद एक बच्चे पैदा करते जाते है ? क्यों ??