रविवार, मार्च 09, 2014

क्यों जन्म दिया ??

मेरे घर से कुछ दूरी पर एक तीनमंजिला मकान बना हुआ हैं जिसमे एक-एक मंज़िल पर कई कई किरायदार रहते है उनमे से ही एक परिवार ऐसा है जिसमे आठ सदस्य है ! माता पिता,चार बेटियां और दो बेटे ! बेटियां बड़ी हैं और दोनों बेटे छोटे ! अक्सर इनमे से सबसे छोटा बेटा जिसकी उम्र तकरीबन आठ या नौ वर्ष की होगी वो अक्सर हमारे घर खेलने आ जाया करता है पहले आने में हिचकिचाता था लेकिन धीरे धीरे वो खुल गया और मेरे बेटे को भी (जिसकी उम्र दो वर्ष है ) उसके साथ खेलना अच्छा लगने लगा ! अब दोनों शाम को अक्सर साथ खेला करते हैं ! मैं भी अक्सर उनके खेल में शामिल हो जाया करती हूँ इसी दौरान मैं उससे कुछ बातें भी कर लिया करती हूँ और बातों बातों में ही पता चला कि वो आठ सदस्यो का परिवार किस तरह रहता है! हुआ यूँ कि एक दिन जब खेलते खेलते बाहर अन्धेरा नज़र आया तब मेरी नज़र घडी पर गयी देखा तो नौ बज चुके थे, मैंने फ़ौरन उसे उसके घर जाने को कहा, "कहा कि बहुत देर हो गयी है अब तुम अपने घर जाओ तुम्हारी मम्मी चिंता कर रही होंगी " "इस पर वो हँसते हुए बोला कि नहीं मेरी मम्मी कुछ नही कहती" मुझे सुन कर हैरानी हुई ! मैंने फिर पूछा क्यों, तुम्हे देर से जाने पर डाँट नहीं पड़ती ?वो बोला "नहीं बल्कि उसकी मम्मी तो सो चुकी होंगी !" ये बात सुन कर हैरानी और बढ़ गयी सोचने लगी कि कैसी माँ है बच्चा घर से बाहर खेल रहा है और वो सो भी गयी !लेकिन उसके बाद जब मैंने उससे इस सब कि वजह पूछी तो जो बात सामने आयी उससे बड़ी हैरानी भी हुई और तरस भी आया !

असल में उस बच्चे की माँ घरो में झाड़ू पौछे का काम किया करती है और उसके पिता बेलदारी का काम करते है लेकिन फिलहाल वो घर में ही रहते है और उस बच्चे के कहे अनुसार उसके पिता रोज़ शराब पी कर घर में झगड़ा करते है और उस बच्चे को भी अक्सर मारा पीटा करते है जिस वजह से वो बच्चा अक्सर देर रात को ही अपने घर जाना पसंद करता है ! उसके बाद उसने बताया कि उसकी मम्मी रोज़ सुबह घर के सभी सदस्यो के लिए खाना बना कर और बाकी काम ख़त्म करके तक़रीबन छह बजे काम के लिए निकल जाया करती है और साथ उसकी बहने भी घरो में काम करने जाती है ! सबसे बड़ी बहन के बारे में उसने बताया कि उसकी शादी हो चुकी है और वो भी घरो में काम किया करती है और एक बहन किसी के घर में रहती है और वही रेह कर काम करती है !फिर मैंने पूछा और तुम दोनों भाई क्या करते हो तो वो तपाक से बोला मेरा भाई मोबाईल की दूकान पर काम करता है (जिसकी उम्र उसे पता नहीं बस इतना पता है कि वो आठवी क्लास में पढता है) और उसे पाँचसौ रुपए महीना मिलता है, और मैं यहाँ आ जाता हूँ ! ये सब सुन कर सच में एक बार तो बड़ा गुस्सा आया कि कैसे माँ बाप है जो अपने बच्चो से इतनी छोटी उम्र में काम करवा रहे है और जिन्हे अपने बच्चो की बिलकुल फ़िक्र ही नहीं कि वो सारा दिन कैसे रहते है कहाँ जाते है क्या करते है ?



अक्सर जब किसी बच्चे को इस तरह के हालात में देखती हूँ तो यही एक सवाल मन में उठता है कि आखिर क्यूँ इसके माँ बाप ने इसे पैदा किया जब वो इसे सही ढंग से पाल ही नहीं सकते तो क्यूँ इस बेचारे की ज़िंदगी इतनी बत्तर बना दी ? ये सवाल मैं अक्सर जब किसी माता पिता से पूछती थी तो जवाब मिलता था "अरे बेटा ये किसी के हाथ में नहीं होता ऊपरवाले ने इनकी किस्मत में यही लिखा है तो कोई क्या करें, कौन से माँ बाप चाहते है कि उनका बच्चा भूखा रहे और पढ़ लिख न सके !" उनकी इस बात पर मैं अक्सर यही सोचती अरे किस्मत उपरवाले ने लिखी है लेकिन किस्मत लिखवाने के लिए ऊपरवाले के पास पैदा करके तो माँ बाप ने ही भेजा है !लेकिन इस सबके बीच एक और बात भी सामने आती और वो ये कि बहुत से लोग सिर्फ एक लड़के के माता पिता कहलाने के चक्कर में इतने बच्चे पैदा कर लिया करते है ! अगर इस बात पर गौर करा जाए तो जिस परिवार का ज़िक्र मैंने किया है उसमे भी चारो बेटियां बड़ी ही है और बेटे छोटे, तो ये माना जा सकता है कि शायद उस माँ ने भी एक अदद बेटे की चाह में इतने बच्चो को जन्म दिया हो !



उफ्फ्फ !! मतलब फिर वही सब, घर में एक बेटा होना चाहिए बड़ा होकर जो माँ बाप का सहारा बनेगा कुल का नाम आगे बढ़ाएगा वगैरह वगैहरा !! अब बेटा होना चाहिए या नहीं होना चाहिए मैं इस विषय पर बात नहीं करना चाहती, हाँ लेकिन मैं एक सवाल उन सभी माता पिता से ज़रूर पूछना चाहूंगी जिन्होंने बेटे कि चाह में कई बच्चे पैदा किये है, क्या वो अपने सभी बच्चो को भरपूर पालन पोषण कर रहे है ?? इसे कुछ यूँ समझते है अभी मैंने ऊपर जिस लड़के की बात की मैं यहाँ भी उसी का उधाहरण देते हुए कहूँगी मैं जब भी उससे कुछ खाने के लिए पूछती तो वो झट से हाँ कह देता और जो भी मैं उसे देती वो बिना स्वाद लिए झट से खा लेता है धीरे धीरे वो रात का खाना भी मेरे बेटे के साथ ही खा कर जाने लगा और मैं भी बड़े शौक से दोनों को खाना खिला देती लेकिन धीरे धीरे मुझे अहसास हुआ कि वो खाना खाने के बाद फ़ौरन ही अपने घर चला जाता था लगा जैसे वो सिर्फ खाना बनने के इंतज़ार में है इतिफाक कि बात है कि अगले ही दिन मुझे खाना बनाने में थोड़ी देर हो गयी और मेरा बेटा भी दूध पी कर सो चुका था तो बचपन मैंने भी उसे जाने के लिए कह दिया लेकिन उस दिन उसका जाने का मन नहीं हुआ असल में वो खाने के इंतज़ार में था तभी मैंने उससे पूछा कि तुम्हारी मम्मी ने क्या बनाया है उसने कहा "पानी वाले आलू" और साथ में ये भी कहा कि उसे वो अच्छे नहीं लगते ! मैंने कहा ठीक है थोड़ी देर रुको फिर यहीं खाना खा जाना और उस दिन के बाद से वो अक्सर रात का खाना मेरे घर पर ही खा कर जाने लगा इस दौरान मैंन जब भी उससे पूछा कि तुम्हारे घर पर क्या बना है तो उसके जवाब में अक्सर पानी वाले आलू ही हुआ करते थे ! अब कोई ये समझाए कि प्रतिदिन आलू कि सब्ज़ी और रोटी खिला देने भर को सम्पूर्ण पोषण कहा जा सकता है ?



अब तक मैंने एक ख़ास वर्ग कि ही बात की लेकिन ये बात सभी पर लागू होती जब हम अपनी कमाई से इतने बच्चो का पालन नहीं कर सकते इन्हे भरपेट भोजन नहीं से सकते, इन्हे अच्छी शिक्षा नहीं दे सकते, तो क्यों इन्हे पैदा करते है ?? क्यों इन्हे बचपन में ही कमाई करने के लिए मजबूर कर देते है ?? क्यों इनका बचपन नरक बना देते है ?? जिस बेटे के लिए इतने बच्चे पैदा किये जाते है क्या उस बेटे की ही आधारभूत ज़रूरत पूरी हो पाती है ??और जिस बेटे को पाने के चक्कर में इतने बच्चे पैदा किये क्या उनकी ज़रूरते हम पूरी कर पाते है ?? क्यों हम अपने ही बच्चो को पिछड़ा और पिछड़ा बनाते चले जाते है, क्यों हम इस सोच से ऊपर नहीं उठ पाते कि बच्चा चाहे जो भी हो लड़का या लड़की हमे उसे हर स्तर पर आगे बढ़ाना है उसकी आधारभूत ज़रुरतो को पूरा करना है !! क्यों हम ना चाहते हुए भी, या सिर्फ एक लड़के की चाह में एक के बाद एक बच्चे पैदा करते जाते है ? क्यों ??



सोमवार, नवंबर 29, 2010

आज यही सही !!!!!

लबो पर उसके कभी बद्दुआ नहीं  होती
बस एक माँ है जो कभी खफा नहीं होती

इस  तरह  मेरे गुनाहों को वो धो देती है,
माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आंसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

अभी जिंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा,
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ  जाती है
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है

ए अँधेरे देख ले मुंह तेरा काला हो गया,
माँ ने आँखें खोल दी घर में उजाला हो गया

मेरी ख्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊ
माँ से इस तरह लिप्टू कि बच्चा हो जाऊ

'मुनव्वर' माँ के आगे यूँ कभी खुलकर नहीं रोना
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती

लिपट जाता  हूँ माँ से और  मौसी मुस्कुराती है,
मैं उर्दू  में ग़ज़ल कहता हूँ हिंदी  मुस्कराती  है

मुनव्वर राणा 
 

बुधवार, अक्तूबर 06, 2010

हमें कोई तो सुधारे !!!!

आज भारत दुनिया के उन देशो में है से एक है जहां की जनसख्याँ में युवाओ की संख्या का  प्रतिशत सबसे  अधिक है और यही वजह है की  आज भारत को "यंग इंडिया" भी कहा जाता है ! ये जान कर ख़ुशी होती है की आज भारतीय  युवा दुनिया में अपनी  एक अलग पहचान बना रहा है ! आज भारत का युवा वर्ग हर क्षेत्र में आगे बढ़ कर अपनी मोजूदगी भी दर्ज़ करा रहा है ! ऐसे बहुत से  यंग लीडर है जिहोने अपने क्षेत्र में ना सिर्फ अपनी एक पहचान बनाई है बल्कि अपने क्षेत्र में कई असरकारक कार्य भी किए है ! अभिनव बिंद्रा,नारायण मूर्ति, ज्योतिरादित्य सिंधिया, प्रियंका चोपड़ा, सुशिल कुमार,बिजेंद्र सिंह, मिताली राज़,झूलन गोस्वामी, अंकित फाडिया, सिद्दार्थ वरदराजन, नारायण मूर्ति, सुष्मिता सेन जैसे नाम आज भारतीय यंग ब्रिगेड का हिस्सा है ! ये वो बड़े नाम है जो आज विश्व पटल पर अपना परचम लहरा रहे है !
वही इसके उलट आज भारतीय युवा वर्ग में एक ऐसा वर्ग भी है जो नाम,दोलत,शोहरत सब  कमाना चाहता है लेकिन बिना किसी मेहनत के या फिर एक बहुत छोटे शोर्टकट के साथ और आज ऐसे युवाओ की संख्या दिनोंदिन बदती जा रही है ! पिछले कुछ दिनों से अखबार के पन्ने ऐसी खबरों से अटे पड़े रहे ! जिसमे से एक खबर में दिल्ली में एक बी कॉम फ़ाइनल ईअर की युवती करोडो के गहनों के साथ पकड़ी जाती है और कुछ दिन पहले गाज़ियाबाद में एक ३० वर्षीय विवाहित युवक करोडो के गहनों के साथ पकड़ा जाता है युवती का गुनाह अभी साबित नहीं हुआ लेकिन युवक के गुनाह के साबित होने के बाद पता लगा की वो अपने शौक के लिए चोरी करता था ! इसके अलावा आज का भारतीय युवा चेन स्नेचिंग,झपटमारी,चोरी की वारदातों, हत्या नशाखोरी, साइबर क्राइम जैसे और ना जाने कितने ही अपराधो में लिप्त होता जा रहा है ! लेकिन इस सबकी वजह क्या है ! क्यों आज युवा वर्ग इस अपराध की दुनिया की तरफ आकर्षित होता जा रहा है ?? बल्कि सारी सुविधाए मिलने के बाद भी क्यों आज धनाड्य वर्ग के युवा भी इस ओर आकर्षित हो रहे है ?? क्यों वो इतनी आसानी से इस ओर मुड़ रहे है ??
अगर इन सबकी वजह तलाशी जाये तो एक नहीं अनेक होंगी ओर सबका अपना अपना कारण  होगा ! सबसे बड़ा कारण जो आजकल ज़्यादातर लोगो के मुह से सुना है वो है आज की फिल्मे और  टीवी पर आने वाले शोस जो इन युवाओ को बिगाड़ने  में पर्याप्त है ! लेकिन क्या सिर्फ यहीं एक कारण है अक्सर बुजुर्गो को युवाओ के पहनावे को लेकर कहते सुना है कि आजकल के लड़के लडकियों ने तो हद ही कि हुई है कोई शर्म हया नहीं बची इनमे ! मुझे याद है कि मेरे घर पर एक बुजुर्ग महिला आती है जो कि हरियाणा से है और अक्सर आज के युवाओ के पहनावे को लेकर अपनी भाषा में एक बात ज़रूर कहती है "आजकल के छोरे छोरियां ने देख के तो  पता ही को नी चालता कि छोरा कोण  ते अर छोरी कोण !" जिसे सुन कर मुझे अक्सर हँसी आ जाती है वैसे उनका कहना  गलत भी नहीं है खुद में एक दो बार मेट्रो ट्रेन में लडको को लड़की समझने की गलती कर चुकी हूँ ! अक्सर देखा जाता है की जहां बड़े बुजुर्ग बैठे हो वहाँ आज के युवाओ पर चर्चा ज़रूर होती है  जिसमे सभी अपने अपने विचार व्यक्त  करते नज़र आते है ! किसी की नज़र में आज का युवा जोशीला होता है तो कोई कहता है की गर्म  खून है इसलिए ऐसा है तो किसी की नज़र में ये सब माता पिता की शय का असर होता है तो किसी की नज़र में ये आजकल की फिल्मो में उटपटांग  चीजों को देखकर बिगड़ रहे है ! 
सबके अलग अलग विचार है आज के युवाओ को लेकर ! जोकि गलत भी नहीं है लेकिन अगर आज के युवा वर्ग को उसी की नज़र से समझा जाए तो और भी कई कारण सामने आयेंगे और सबसे बड़ा और पहला कारण जो मुझे नज़र आता है वो है "पियर प्रेशर" जो बहुत ज़ल्दी और गहरा असर करता है और जिसने कभी मेरे ऊपर भी असर करने की कोशिश  शुरू की थी  लेकिन उस वक़्त अपने टीचर्स और मम्मी-पापा के सपोर्ट के चलते मैं तो इस पियर प्रेशर से बच गयी, लेकिन ये सच है कि इसकी वजह से कई युवा ना चाहते हुए भी ऐसे काम करने लगते  है जिसे वो जानते है कि वो गलत है लेकिन अपने दोस्तों के सामने टशन मारने के लिए और उनके सामने खुद को कमतर ना आंके  जाने लिए वो इसे ज़रूरी भी समझते है ! ये इसी का नतीजा है कि छोटी सी उम्र में ही कश लगाने से लेकर ड्रग्स जैसी नशीली चीजों के प्रोयोग से वे खुद को मोर्डन और बेहतर साबित करना चाहते है इसके अलावा आज अक्सर एक चीज़ जो हर छोटे चौक चोराहो  से लेकर मॉल्स, शोपिंग काम्प्लेक्स जैसे बड़ी जगहों पर नज़र आती है और वो ये है, हाथो में हाथ डाले घूमते हुए प्रेमी युगल ! अब वो कितने सच्चे और कितने झूठे होते है ये तो वही जाने लेकिन इस सबसे एक बात ज़रूर साबित हो जाती  है की गर्ल फ्रेंड और बॉय फ्रेंड रखना अब एक फैशन  बन गया है ठीक उस तरह जैसे कि कभी महंगे मोबाईल और गेजेट रखना फैशन के साथ-साथ स्टेटस सिम्बल हुआ करता था  और अब ये फैशन इस कदर परवान चड़ने लगा है कि युवा वर्ग अपनी इन ज़रुरतो को पूरा करने के लिए अपराधिक दुनिया में कदम रखने से भी नहीं हिचकता बल्कि अब वो अपनी इंटेलिजेंस, अपने जोश और जूनून का भरपूर फायदा अपराध जगत में शमिल होकर उठाने लगा है ! अभी पिछले दिनों एक फिल्म आई थी "बदमाश कम्पनी" जिसमे कुछ युवाओ को अपने अनोखे लेकिन "गैरकानूनी" आइडियास के चलते शोर्टकट के सहारे लखपति बनते दिखाया गया था ! वास्तव में यही है आज का कडवा सच ! जिसे आज हर कोई सुधारना चाहता है !
हम युवाओ को सुधारने कि ज़िम्मेदारी हमारे अपनों की ही है लेकिन जिस तरह गहनों की चोरी के मामले में पकड़ी गयी लकड़ी को उसके घरवाले ने इज्ज़त का हवाला देते हुए उसे अपने घर से बरसो पहले निकाल दिया था अगर इसी तरह आज हर माता-पिता करने लगे तो शायद ही कोई सुधरे इसलिए अगर आज वास्तव में पथ भ्रमित हो चुके युवाओ को कोई सुधारना चाहता है या सुधार सकता है तो वो उनके टीचर्स और उनके माता-पिता ही है खासतौर पर टीचर्स की ज़िम्मेदारी थोड़ी ज्यादा होती है क्योंकि घर के बाहर एक वही होते है जो हमें समझ सकते है और समझा सकते है !

सोमवार, सितंबर 13, 2010

परफेक्ट होना बोरिंग है !

अभी कुछ दिन पहले की बात है जब मैं अपनी ही एक फ्रेंड के घर गयी थी, बड़ी परेशान थी बेचारी और इस परेशानी में लगी हुई थी धडाधड अपने नाख़ून चबाने ! मुझे आज तक समझ नहीं आया कि  लोग परेशान होने पर अपने नाख़ून क्यों चबाने लगते है ! छी बहुत गन्दी आदत है ये ! खैर, उसकी इस परेशानी को देख कर मैंने उससे पूछा क्या हुआ क्यों परेशान है ? तब उसने थोडा सोचते हुए कहा की उसे समझ  नहीं आ रहा की "उसका ब्वाय फ्रेंड उसके लिए परफेक्ट है या नहीं"........ ये सुन कर मेरे मुहँ से निकला ....... है ?????? दरअसल वो  और उसका  ब्वाय फ्रेंड पिछले तीन साल से साथ है और अब तो घरवालो  की मंजूरी  भी मिल गयी है लेकिन आज अचानक ये सुन कर पहले मुझे हँसी आ गयी हंसी इसलिए क्योंकि दरअसल वो हमेशा अपने ही बनाये सवालों में अक्सर उलझ जाती है  और  पता था की आज भी ऐसा ही होने वाला  है ! लेकिन आज तीन साल बाद उसे क्या सूझी और वो भी तब जबकि उन दोनों की फैमली उनके रिश्ते पर अपनी मोहर लगा चुकी है ! तब मैंने पूछा की क्यों ऐसा क्या हो गया आज, कि तीन साल बाद  आज तू ये सब सोच रही  और तब जो उसने बताया वो तो और भी मजेदार था दरअसल उसने कुछ दिन पहले आमिर खान का किसी चैनल  पर interview देखा था अब आमिर खान तो वैसे भी मिस्टर परफेक्शनिस्ट कहलाते है (लेकिन अपने काम की वजह से) लेकिन मेरी फ्रेंड को ये सनक सवार हो गई कि उसका ब्वाय फ्रेंड भी मिस्टर परफेक्ट होना चाहिए आमिर खान की तरह और बाकि सभी लोग भी उसके ब्वायफ्रेंड को जो कि अब उसका होने वाला हसबेंड है इसी नाम से बुलाये "मिस्टर परफेक्शनिस्ट !
अब ये सब सुन कर मेरे मुंह से एक ही शब्द निकला "हे भगवान्" ! फिर मैंने पूछा की तुझे कैसा मिस्टर परफेक्ट चाहिए उसने बताया, जो सारे काम टाइम से करे टाइम पर घर आए टाइम पर ऑफिस जाए टाइम पर उठे टाइम पर सोये टाइम पर खाए सब कुछ एक दम टाइम पर करे  ...ओह तो तुझे टाइमटेबल चाहिए मेरा इतना कहना था कि ये सुन कर उसने मुझे कुछ ऐसे देखा की मुझे पता चल गया की अगर मैंने कुछ और बोला तो मेरा जिंदगी का टाइम टेबल बिगड़ जायेगा खैर, ये सुन कर अपने गुस्से पर काबू करती हुई वो बोली नहीं तुझे कुछ नहीं पता परफेक्ट ऐसे ही  होते है और मिस्टर परफेक्ट ही सब कुछ होता है , तब मैंने कहा कि  लेकिन मैंने तो सुना है की कोई भी परफेक्ट  नहीं होता और ये सही भी है...... ये सुन कर वो बोली प्रवचन  मत दे मुझे भी पता है कोई परफेक्ट नहीं होता लेकिन होना तो चाहिए ना !!!! हाँ तो तू होना तो चाहिए के चक्कर में जो है उसकी दुश्मन क्यों बन रही है !
खैर, ये बहस थोड़ी आगे जाकर ख़त्म हो गयी क्योंकि सभी को पता था की उसकी उलझन दिन बीतने के साथ दूर हो जाएगी हर बार की तरह ! लेकिन इस पूरी बहस से एक बात दिमाग में कोंधने लगी और वो ये की क्या "परफेक्ट होना ही सब कुछ है ???" और एक परफेक्ट इंसान कैसा होगा अब इस पर मेरा विश्लेषण शुरू हुआ जो कुछ -कुछ मेरी फ्रेंड के कहे अनुसार ही था शायद एक परफेक्ट ऐसा होगा जो रोज़ सुबह ठीक 5  बजे उठे उसके बाद फ्रेश होकर एक घंटे योगा करे फिर उस दिन का अखबार पढे ठीक टाइम पर नाश्ता करे ठीक टाइम पर ऑफिस जाए ठीक टाइम पर घर आए सही समय  पर लंच करे डिनर करे अच्छा सोचे कभी गुस्सा ना करे सभी से अच्छी तरह से बर्ताव करे कभी किसी से कोई झगडा नहीं करे कोई बुरी आदत नहीं हो सभी काम समय पर पूरे करे हमेशा अच्छा ही सोचे ! ईईईईई........ ऐसा इंसान भगवान् ने मेनुफेक्चर किया होगा ???? और अगर किया भी है तो क्या वो आज की लाइफ में सभी को अच्छा लगेगा ?????
माना कि आज सभी को   परफेक्शन  चाहिए लेकिन अगर हर कोई परफेक्ट हो जायेगा तो लाइफ तो बोरिंग हो जाएगी ! मतलब, अगर हर कोई सारे काम टाइम पर करने लगे कोई गलती ना करे किसी को शिकायत का मौका ना दे तो जिंदगी आधी से ज्यादा परेशानिये तो दूर हो जाएँगी लेकिन उसके साथ ही साथ जिंदगी नीरस भी हो जाएगी ! क्या मैं गलत कह रही हूँ ??? एक उधारण लेते है अगर एक घर में सभी लोग परफेक्ट हो जाये और  सभी लोग एक जैसे सोचने लगे एक जैसी बाते करे एक जैसे ही समय पर काम करने लगे तो ??? तब घर में सबसे पहले तो बच्चो को अपने बड़ो से डांट पढनी बंद हो जाएगी और दूसरा घर के किसी भी सदस्य में कोई बहस नहीं होगी टीवी रिमोट के लिए झगडा नहीं होगा क्योंकि तब तो एक ही चैनल चलेगा आखिर सब एक जैसा जो सोचने लगेंगे और जब एक जैसा सोचेंगे तो एक जैसा देखेंगे भी ! अब अगर यही उधारण हम थोड़े बड़े स्तर पर ले मतलब कि अगर आज देश का हर सरकारी कर्मचारी अपने काम में परफेक्ट हो जाये और अपने सारे काम टाइम पर करने लगे तो बेचारे विपक्ष का क्या होगा ?? तब विपक्ष की दुकान कैसे चलेगी बल्कि तब तो विपक्ष की भूमिका ही ख़त्म हो जाएगी ! अरे विपक्ष छोड़ो तब तो शायद देश में सरकार की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि तब जनता नेता सभी एक जैसा सोचने लगेंगे और तब ना तो कोई झगडा होगा और ना ही कोई बहस सब कुछ एक ही धारा में चलता जायेगा बिना कुछ सोचे ! उफ्फ्फ .....ये परफेक्ट ढूंढने के चक्कर में विश्लेषण ने अजीब ही दिशा पकड़ ली लेकिन बात सही है की अगर हर इंसान एक जैसा सोचने लगेगा और बिना कोई गलती किए हर इंसान अपने सभी काम समय पर करने लगेगा तो लाइफ शायद बोरिंग हो जाएगी !
अपने इस पूरे विश्लेषण के बाद एक बात समझ में आई अव्वल तो कोई परफेक्ट होता नहीं और अगर कोई इस कदर परफेक्ट होगा तो वो बोरिंग होगा या फिर टाइमटेबल होगा ! तो Don't be paerfect but be Good .....

रविवार, अगस्त 29, 2010

चलती फिरती ब्लोगिंग !!!

जब से इस ब्लॉग जगत में कदम रखा है इस ब्लोगिंग के कीड़े ने ऐसा काटा है की हर तरफ बस ब्लॉग नज़र आते है मतलब की जहां भी कुछ लिखा दिखे उसे पढ़ कर कमेन्ट देने की इक्छा प्रबल होने लगती है ! अब चाहे  वो पूरा ब्लॉग हो या फेसबुक और ट्विटर जैसी  साईट पर किसी का स्टेटस या फिर किसी की लिखी चार लाइने,  लेकिन ये सब तो रही इन्टरनेट की बात लेकिन उसका क्या जो हमारे आस पास चलते फिरते ब्लॉग घूमते है !
अभी पिछले दिनों दिल्ली से बाहर जाना हुआ बाढ़ के डर से नहीं किसी ज़रूरी काम से और बस वही हाइवे पर नज़र आए ये एक के बाद एक चलते फिरते ब्लॉग ! हाइवे से गुजरते हुए रास्ते में कई ट्रक और मिनी ट्रक और टेम्पो आदि देखे जिन पर लिखी लाइने किसी माइक्रो ब्लोगिंग से कम नहीं थी ! वैसे उन सभी को पढ़ कर आज की सबसे प्रचलित माइक्रो  ब्लोगिंग साईट ट्विटर की याद आ गयी वास्तव में इन ट्रक वालो ने तो चलता फिरता ट्विटर ही खोल रखा है और ट्विटर इसलिए क्योकि जिस तरह ट्विटर पर अपनी बात कहने के लिए आपके पास 140 शब्दों की सीमा होती है उसी तरह ये भी अपनी बात कुछ शब्दों में ही कह देते है ! अब मैंने इनकी चलती फिरती ब्लोगिंग में जो कुछ भी पढ़ा वो बड़ा ही रुचिपूर्ण और असरकारक लगा ! आप भी पढ़िए
तेरे यार दा ट्रक (तेरे पास कैसे आया)
जट दी मर्सिडीज़ (नीले रंग की)
13 मेरा 7 (?????)
चल मेरी रानी कम पी इराक का पानी (मैंने तो सुना था गाड़िया डीज़ल और पेट्रोल से चलती है)  
जट रिस्की आफ्टर विस्की ( हा हा हा )
सत्येन्द्र का सत्तू (पता नहीं कहा मिलेगा)
दिल 20 तेरा 80 20  तेरे ( वाह वाह वाह )
यो तो ऐसे ही चाल्लेगी ( चला चला आगे तेरा मामा तेरा इंतजार कर रहा है )
अनारकली भर के चली (बदबूदार कूड़ा)
यारां दा टशन ( बजाएगा मामा का बैंड )
वजन घटाए सिर्फ 45 दिनों में (जय हो बाबा रामदेव )
सोनू मोनू दी गड्डी (तो सोनू मोनू कहाँ है)
बुरी नज़र वाले तेरा मुहँ कला ( कोई नी जी फेयर एंड लवली है ना )
होर्न प्लीज़ ( सॉरी, होर्न ख़राब है )
फिर मिलेंगे (इस बारे में सोचा जायेगा )
तो ये थी मेरी चलती फिरती ब्लोगिंग अरे नहीं मेरी नहीं उन ट्रक वालो की जिन्हें मैंने पढ़ा लेकिन कमेन्ट यहाँ किया ! वैसे ऐसी चलती फिरती ब्लोगिंग पढ़ कर समय कब कट गया पता ही नहीं चला ! आपने भी ऐसी ही चलते फिरते ब्लॉग देखे होंगे,  तो ज़रा आप भी बताईये अपने कमेन्ट के साथ !

शुक्रवार, अगस्त 13, 2010

आज़ादी या सरकारी छुट्टी ???

15 अगस्त 1947  ये वो दिन था जब हमारा "भारत" आज़ाद हुआ और हमें अग्रेज़ी हुकूमत से आज़ादी मिली ! "आज़ादी", क्या है ये आज़ादी ? क्या मतलब होता है देश की आज़ादी का ? ये प्रश्न इसलिए क्योकि मैंने अग्रेज़ी हुकूमत की गुलामी नहीं देखी, देखा है तो सिर्फ आज का भारत जिसे आज़ाद(?) कहा जाता है ! मुझे नहीं पता की जब भारत गुलाम था तब वो कैसा था ? उस वक़्त के लोगो का गुलामी को लेकर क्या मनोभाव था ? उस वक़्त लोग किस हद तक अपने देश से प्यार करते थे ? उस वक़्त का  गुलामी का मंजर कैसा रहा होगा ? कितना जूनून था लोगो में अपने देश की आज़ादी को लेकर ? लोग किस कदर देश की आज़ादी के लिए अपना खून बहाने के लिए तत्पर थे ? माँए, कैसे अपने बेटो को अपने देश के लिए शहीद होने के लिए भेज दिया करती थी ? ये और इस जैसे और ना जाने कितने ही प्रश्न आज मन में उठते है क्योंकि मैंने गुलाम भारत नहीं देखा ! देखा है तो सिर्फ आज का भारत, जो की में अब देख भी रही हूँ  ! 
भारत को मिली आज़ादी  के बारे में सिर्फ वही सब जानती हूँ जो अब तक किताबो और अखबारों में पढ़ा फिल्मो में देखा  और बुजुर्गो से सुना है (और उपरवाले से ये प्रार्थना करती हूँ की फिर कभी वो मंज़र ना देखने पड़े !) उस सब पर यकीं करते हुए कहती हूँ की भारत वास्तव में एक सोने की चिड़िया हुआ करता था जहां की मिटटी सोना उगलती थी, सभी में आपसी भाई चारा था, तब हर कोई अपने देश से  प्यार करता था, अपनी आज़ादी को जीता था, भारत की आज़ादी के लिए जो शहीद हुए, तब उन्हें भगवान से कम नहीं आँका जाता था !  सभी लोग 15 अगस्त को लाल किले पर होने वाले समारोह को कोसो दूर से पैदल चल कर देखने आया करते थे ! ये था आज़ादी का वो जूनून जो बिना किसी लागलपेट के बिना किसी स्वार्थ  के सभी के अन्दर था ! ये था, वो आज़ाद भारत जिसे सोने की चिड़िया  कहा जाता था,  लेकिन  मेरे लिए तो ये  सब एक सपने जैसा ही है !
अब अगर आज के भारत की बात की जाए तो आज आज़ादी के जश्न का मतलब ही ख़त्म हो गया ! आज 15 अगस्त और 26  जनवरी जैसे दिन सिर्फ एक सरकारी छुट्टी से बढ़ कर और कुछ नही है  ! आज जब घर के बड़ो से  आज़ाद भारत की कहानी सुनती हूँ तो उस भारत और आज के भारत में एक फर्क देखने लगती हूँ क्योंकि मेरे लिए आज़ादी के बाद का भारत और आज का भारत,  जो की आज़ाद (?) कहलाता है दोनों में फर्क है !
भारत को तो आज भी सोने की चिड़िया कहा जा सकता है क्योकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और वो आज भी कृषि उत्पादन में विश्व पटल पर छाया हुआ है ! कम ही लोग जानते होंगे की भारत आज गेंहू उत्पादन में विश्व में दूसरे स्थान पर है और चावल के उत्पादन में भी भारत विश्व में दूसरे स्थान पर है ! विश्व में चावल और गेहूं जैसे आधारभूत अनाज के उत्पादन में  दूसरा स्थान प्राप्त करने के बाद भी आज भारत में कितने ही ऐसे लोग है जो भर पेट भोजन के लिए भी तरसते है और कितने ही ऐसे लोग है जिन्हें साफ़ सुथरा अनाज मिलता होगा ?? आज सडको चोराहो पर ना जाने कितने ही छोटे बच्चे हाथ फैलाए खड़े नज़र आते है !
ये उस भारत के हाल है जहां की मिटटी आज भी सोना उगलती है लेकिन अफ़सोस ये है की वो सोना सही हाथो  में नहीं पहुँच पाता ! ये अनाज जब खेतो से निकल कर सरकारी मंडियों से होता हुआ जब लोगो तक पहुँचता है तो उसमे से ज्यादातर अनाज तो सड़ चुका होता है और निर्यात करने के बाद जो थोडा बहुत साफ़ सुथरा अनाज बचा होता है उसकी कीमत कहीं ज्यादा होती है ! हमारे  देश में  कितने ऐसे लोग है जो गेहूं और चावल के इतने बड़े उत्पादक देश के वासी होने पर भी बासमती चावल और शुद्ध गेहूं का आटा खरीद पाते है ??
इसके अलावा भी भारत में आज भी कई ऐसी खूबियाँ है जिनके लिए हम भारत के कृषि उत्पादन का शुक्रिया अदा कर सकते है ! आज भारत ना सिर्फ गेहूं बल्कि कपास  और चीनी के उत्पादन में विश्व में तीसरे स्थान पर है लेकिन यहाँ भी यही हाल है ! ना तो किसी को साफ़ और उचित मूल्य पर चीनी मिल पाती और ना ही ऐसा कभी हुआ की कपास के इतने बड़े उत्पादक होने पर भी सर्दियों में ठण्ड से किसी की जान ना गयी हो ! आखिर इस सब की वजह क्या है ? क्यों हम लोग अपने देश की इन खूबियों को जी नहीं पाते है ! इसका एक ही जवाब होगा और वो है भ्रष्टाचार, जिसमे हमारे  देश ने विश्व में  84 वां स्थान प्राप्त किया है ! लेकिन जिस गति से ये भ्रष्टाचार अपने पैर फैला रहा है उससे तो यहीं डर है कि कहीं 84 का आंकड़ा उल्टा ना हो जाये !
ये है हमारे आज़ाद भारत का एक छोटा सा सच ! आज जो हालात देश के है और जिस क़र्ज़ में हमारा देश डूबता जा रहा है और जिन लोगो के हाथ में देश की कमान है उसके आधार पर कह सकते  है की देश ना तो राजनितिक रूप मे आज़ाद है और ना ही आर्थिक रूप में और आज की जो राजनितिक स्थिति  है उससे तो यही लगता है की देश शायद फिर से गुलाम हो जायेगा ! लेकिन क्या इसके लिए सिर्फ हमारे देश के भ्रष्ट नेता और हमारा कमजोर प्रशासन ही जिम्मेदार है ??? आज भी कश्मीर और राम मंदिर जैसे मुद्दे राजनेताओ की सियासी रोटियां सेकने के काम आते है ! ये वो मुद्दे है जो अगर सुलझ गए तो नेताओ का वोट मांगने का जरिया ख़त्म हो जायेगा !
लेकिन  इसमें गलती सिर्फ इन नेताओ की तो नहीं है ! जब भी भ्रष्टाचार की बात आती है तो लोग अक्सर सफेदपोशो और खाकी वर्दी को कोसने लगते है कि इन्होने देश का सत्यानाश कर दिया ! ये देश को फिर से विदेशी ताकतों का गुलाम बना देंगे ! इन्होने ऐसा कर दिया वैसा कर दिया ये कर दिया वो कर दिया वगेरह-वगेरह ! लेकिन एक बार खुद से पूछ कर देखिये क्या हम सभी अपने देश के लिए समर्पित है ??? क्या हमारे अन्दर आज़ाद भारत की आज़ादी का जश्न बनाने का जज्बा है ??? क्या हम 15 अगस्त के अलावा कभी और अपने शहीदों  को याद कर पाते है ?? क्या हमने कभी कोई भ्रष्ट काम नहीं किया ?? क्या हमने कभी किसी को रिश्वत नहीं दी ?? क्या हमने कभी अपने गलत काम को सही करवाने के लिए सिफ़ारिशो और नोटों  का सहारा नहीं लिया ??? ऐसे और भी ना जाने कितने ही सवाल है जिनके जवाब शायद नहीं में ही होंगे  और शायद ही क्यों पक्का होंगे  ! चलिए "गाँधी जी" की कही बात को याद करते है उन्होंने कहा था "जब हम किसीपर एक ऊँगली उठाते है  तो बाकी की तीन उँगलियाँ हमारी  तरफ ही होती है !" इसके अलावा ये भी सुना ही होगा "स्वयं को सुधारो, जग सुधरेगा !" वैसे ये सब तो में अपने एक पूर्व लेख में भी कह चुकी हूँ ! जिसमे एक कमेन्ट जो  "आशीष" जी के नाम से आया था उसमे उन्होंने बड़े ही खुले अंदाज़ में अपने जुगाड़ लगाने की बात कबुली थी !
आज हमारे समाज में कई लोग ऐसे है जो इन सब चीजों  का सहारा लेते है और कोस देते है सिस्टम को लेकिन हम ये भूल जाते है कि इस सिस्टम को ऐसे बनाने वाले भी हम लोग ही है इन नेताओ का चदावा चडाने वाले भी  हम लोग ही है और कह देते है कि छोड़ो यार जैस चल रहा है चलने दो अपना काम तो हो रहा है ना बस और  क्या चाहिए ! कहीं  बम  ब्लास्ट  हो जाये  तो पहले  अपने  लोगो  कि खैर  खबर  ले  लो  वो  सब तो ठीक  है ना और जब  सभी  के ठीक  होने  कि खबर  मिल जाती  है तो यहीं  कहते  है शुक्र  है हम बच  गए  ! लेकिन कब   तक  ??? आज तो हम बच गए  क्या ये  ज़रूरी  है कि कल  किसी  और बम  ब्लास्ट  में भी हम बच  जाए  ! क्या इस आतंकवाद  को जड़  से ख़त्म  करने  में हमारी  कोई  भूमिका  नहीं  है  ??  मेरी  नज़र  में ये है हमारे   आज  के  आज़ाद  भारत कि कहानी जहां हर कोई एक दूसरे पर दोष   मड देता  है लेकिन कोई भी खुद  को सुधारने  कि कोशिश  नहीं  करता  !
आज हमारे भारत  को फिर  से आज़ादी की ज़रूरत  है और वो  आज़ादी हमें भ्रष्टाचार, आतंकवाद , घोटालो , बड़ते  अपराध , बढती  हुई  महगाई  कश्मीर और राम मंदिर जैसी और भी कई समस्याओं  से तो  चाहिए लेकिन उस  सबसे  पहले  हमें अपनी  छोटी  मानसिकता  से आज़ादी चाहिए ! जो इन सियासतदारो को  अपनी गन्दी सोच और अपनी घटिया सियासत चलाने  का मौका देती है तो उठाईये   आज़ादी कि तरफ  कदम  माना  की मुश्किल  है लेकिन नामुमकिन   तो नहीं  ! कब तक बैठे के इन मंत्रियो के सहारे ??
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मंगलवार, अगस्त 03, 2010

अभी तो मुजरा शुरू हुआ है !

कुछ हफ्ते पहले एक फिल्म  आई थी "राजनीति" जिसमे   वर्तमान राजनीति को दिखाने की कोशिश की गयी थी और अब पिछले हफ्ते एक फिल्म आई थी "खट्टा मीठा", इस फिल्म में पी डब्ल्यू डी और एम् सी डी जैसे विभागों के काम करने के तरीके को दिखाया गया है इस फिल्म में अक्षय कुमार ने एक बड़ा ही सटीक डायलोग बोला है  कि " पैसा दो तो पुलिस मुजरा भी करेगी" तो लीजिये हो गया मुजरा शुरू ! अभी तो कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू भी नहीं हुए  और सभी विभागों ने अपना-अपना मुजरा शुरू कर दिया ! सभी की कारगुजारिया धीरे-धीरे  करके बाहर आने लगी है और ये तो होना ही था भई, ये भारत  देश है जहां सौ में से नब्बे  बेईमान का नारा लगता है , तो इतना बड़ा करोडो का गेम्स प्रोजेक्ट आखिर शराफत से कैसे संपन  हो सकता  है घपला तो होना ही था लेकिन उस घपले की पोल गेम्स से ही पहले खुल जाएगी ये  अंदाजा कम ही था, लेकिन इसकी भविष्यवाणी हमारे "चैतन्य" भाई मेरी पिछली पोस्ट "अच्छा, महंगा ..................हमारा शहर दिल्ली !" पर कर चुके थे !  हालांकि उनकी ये भविष्यवाणी  बारिश से होने वाली समस्याओं को लेकर थी !

खैर, अभी तो मुजरा शुरू ही हुआ है वैसे मुजरा तो लगभग आज हर सरकारी और गैरसरकारी विभाग करता है लेकिन इस मुजरे के पीछे किसका हाथ है ये खुलने में समय लगता है और समय भी इतना की एक पूरी नस्ल जवान हो जाये और यहाँ भी यही होने वाला है ! अभी बहुत से ऐसे लोग है जिन्होंने खा कर डकार भी नहीं मारी है बल्कि उनका खाना पीना अभी चालू ही है या अगर अक्षय के स्टाइल में ही कहूँ तो उनके मुजरे तो अभी चालू है और अब इन मुजरो से सबसे ज्यादा परेशानी उस पक्ष (विपक्ष) को होने वाली है जिसे ये मुजरा करने को नहीं मिला और अब शुरू होगा पक्ष और विपक्ष का कोमन्वेल्थ गेम, जिसका नतीजा तो ऊपरवाला ही जाने या फिर धरती पर बैठा कोई ज्ञानी !  मैं अज्ञानी तो इसका नतीजा नहीं बता सकती !
अब हर कोई, क्या जनता और क्या नेता, वो सब जो इस मौके की तलाश में ही थे कि कब मौका मिले और वो कब चौका मारे तो उनकी तो इस घपले कि खबर सुन कर बाछे ही खिल गयी ! अरे भई, अंधे को क्या चाहिए दो आँखे, सो मिल गयी ! जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों की शुरुवात तो हो चुकी है ! अब देखना ये है कि ये खेल उस खेल से कितना लम्बा चलता है ! गेम्स तो कुछ दिन में निबट जायेंगे  लेकिन ये "खेल" तो पीढ़िया देखेंगी !
इन "खेलो" की भनक शायद इतनी जल्दी नहीं लगती अगर इंद्र देवता मेहरबान ना होते क्योकि बारिश ने ही घटिया मेटेरियल की पोल खोली है ! कहीं स्टेडियम स्विमिंग पुल में तब्दील हो चुके है तो कहीं की टाइले उखड-उखड कर खिलाडियों को ज़ख़्मी करने लगी है ! कहीं वर्ल्ड क्लास स्टेडियम का दर्ज़ा पाने वाले स्टेडियम की छत टपकने लगी है तो कहीं के हाई क्लास रोड तालाब बनगए है और ये सब तब है जबकि इन प्रोजेक्टों को पूरा करने के लिए कई वर्ल्ड क्लास  विदेशी कम्पनियों को टेंडर दिए गए थे ! कल ट्विटर पर जूनियर बच्चन  ने एक ट्विट पोस्ट की "कोई तो बारिश बंद करवाओ वर्ना कोमनवेल्थ कमिटी को स्विमिंग पुल बनाने की ज़रूरत नहीं होगी क्योकि उसके लिए सड़के ही काफी होंगी !"  दिल्ली की हालत देख कर तो कई लोग सोशल नेटवर्किंग साईट पर अपने स्टेटस में ये कहने लगे है कि "दिल्ली किस मुहँ से बारिश होने की दुआ कर रही है !" अभी कुछ दिन पहले एक मंत्री ने अपने कोमनवेल्थ गेम्स को लेकर  ब्यान में ये दुआ  मांगी कि " भगवान् गेम्स के दौरान इतनी बारिश हो कि गेम्स बर्बाद हो जाये !" अब अगर सता के गलियारों में बैठे ये नेता गण अपने फायदे के लिए साफ़ तौर पर देश की इज्ज़त की धज्जियाँ उड़ने के ख्वाब देखेंगे तो बेचारी जनता अपना सहयोग क्यों देगी !
इन "खेलो" कि खबर लीक होने से एक सबसे बड़ा फायदा  या नुक्सान ये हुआ कि  2019 में होने वाले एशियाड खेलो के लिए भेजी जाने वाली दावेदारी सरकार कि तरफ से नामंजूर होने की गंध आने लगी है ! हालाँकि इन घपलो पर "शीला" सरकार और कोमनवेल्थ गेम्स के चेयरमेन "सुरेश कलमाड़ी" ये चीख-चीख कर कह रहे है की कोई घपला  नहीं हुआ और उनके पास सारा हिसाब मौजूद है लेकिन क्या आप इस पर विश्वास करेंगे ??? अभी तो सिर्फ धुआं उठना शुरू हुआ है लेकिन आग तलाशनी बाकि है ! क्या लगता है उस आग तक पहुचने में कितना समय लगेगा ??? या फिर उस आग तक पहुंचा ही नहीं जा सकेगा ! चलिए एक और प्रश्न का जवाब तलाशते है !