गुरुवार, मई 13, 2010

धर्म बड़ा या कर्म फैसला आपका ........

 मुझे धर्म के नाम पर बोलना ज्यादा आता नही क्योकि या तो इसका ज्ञान मुझे नहीं है या फिर जितना है वो बहुत थोडा है और इस आधे अधूरे ज्ञान के सहारे मैं अज्ञानता नहीं फैलाऊंगी ! हाँ, लेकिन आज एक कहानी ज़रूर सुनाउंगी जिससे ये तय हो सके की जिस धर्म के लिए हम अक्सर लड़ते है,या जिस धर्म के नाम पर हमारे नेता अपना वोट बैंक भरने की जुगत में लगे रहते है  वो धर्म ज्यादा बड़ा है या फिर हमारा कर्म ! एक गाँव  में एक परिवार रहता था जिसमे सिर्फ तीन लोग थे एक बूदी  माँ उसका बेटा और उसकी पत्नी ! एक बार की बात है कुम्भ का मेला लगा हुआ था तब माँ ने अपने बेटे से इच्छा जाहिर की कि बेटा मेरी तो उम्र हो गई है सोच  रही हूँ इस दुनिया से विदा लेने से पहले कुम्भ नहा लू ! बेटा, माँ कि इस इच्छा को सुन कर बोला हाँ माँ अगर तेरा मन है तो मैं तुझे ज़रूर कुम्भ ले जाऊंगा इस पर माँ बोली नहीं ठीक है बेटा तू मेरे जाने के तयारी कर दे और बहु से कहा कि बहु मैं कुम्भ जा रही हु रास्ते में खाने के  लिए कुछ बना देना बहु को अपनी सास का कुम्भ जाना अच्छा नहीं लगा क्योकि उसे खर्चे कि चिंता थी उसने अपने पति से पूछा कि क्या बनाऊ सास के लिए तो बेटे ने बोला  लड्डू बना दो माँ को ताकि माँ को खाने कि परेशानी ना हो इस पर बहु और चिद गई उसने गुस्से में आकर अपनी सास के आटे कि भूसी के लड्डू बना दिए और अपनी सास को दे दिए ! अगले दिन बेटा अपनी माँ को लेकर कुम्भ पहुच गया और माँ को एक झोपडी में ठहरा दिया और कुछ दिन बाद ले जाने के लिए कह कर चला गया ! अब वो बूदी माँ रोज़ सुबह उठती और गंगा स्नान करके अपनी झोपडी में आकर पूजा पाठ में लग जाती जैसे ही उसकी पूजा खत्म हुई तो उसे भूख लगी और उसने खाने के लिए लड्डू निकाले जो उसकी बहु ने बना कर दिए थे परन्तु जैसे ही लड्डू खाना चाहा वैसे ही किसी ने दरवाज़े के बाहर से आवाज़ लगाई "टातरिया खाद्काऊ गोपाल लड्डू पाउ" माँ उठ कर देखा तो एक छोटा सा बालक दरवाज़े पर खड़ा था, माँ ने बड़े प्यार से उसे अपना लड्डू दे दिया ! अगले दिन जब वो बूदी माँ फिर से स्नान करके आई और फिर से अपने लड्डू निकले तो तभी वो बालक दौबारा आ गया और फिर से यही कहने लगा "टातरिया खाद्काऊ गोपाल लड्डू पाउ" माँ ने फिर से उसे अपनी थाली का लड्डू दे दिया इसी तरह रोज़ ऐसा होने लगा और इस तरह माँ के अपने साथ लाये हुए सभी लड्डू वो बालक ही खा गया ! अब कुछ दिन बाद उस माँ का बेटा उसे ले जाने के लिए आया तब माँ स्नान करने के लिए गई हुई थी तब उस बेटे ने दिखा कि झोपडी में चारो तरफ स्वर्ण मुद्राए बिखरी हुई है जब उसकी माँ स्नान करके वापस आई तब उसने अपनी माँ से पूछा माँ ये सब किसके है माँ ने कहा बेटा पता नहीं इस झोपडी में मेरे सिवा तो कोई नहीं आता तब बेटे ने वो सभी मुद्राए उठाई और अपनी माँ के साथ उन्हें भी अपने घर  ले गया ! जब उसकी बहु ने ये सब देखा तो उसने अपनी माँ को भी कुम्भ में जा कर स्नान करने के लिए कहा और अपनी माँ के लिए उसने असली घी और मेवे और गुड के लड्डू बनाये और अपने पति से कहा वो उसकी भी माँ को कुम्भ में ले जाए ! तब वो बेटा अपनी सास को लेकर कुम्भ में ले गया और उसे भी एक झोपडी में ठहरा कर कुछ दिन बाद आपने के लिए कह कर चला गया अब उस बहु कि माँ रोज़ सुबह उठती और स्नान करके झोपडी में ही बेठ कर पूजा करने लगती वो पूजा कर करके जैसे ही अपने खाने के लिए लड्डू निकलने लगी तभी दरवाजे पर से एक आवाज़ आई "टातरिया खाद्काऊ गोपाल लड्डू पाउ" तब उस बहु कि माँ ने जवाव दिया 'जा मरे, गुड घी के लड्डू धी के जमाई के तोय दोऊ या आप खाऊ" ऐसा कह कर उसने उस बालक को वहाँ से भगा दिया और इसके बाद अब रोज़ ऐसा होने लगा वो बालक रोज़ आता और रोज़ वो उसे ऐसे ही भगा देती ! अब कुछ दिन बाद उसका जमाई उसे वापस लेने आया तो उसने झोपडी में देखा तो उसे अपनी सास वहाँ ना दिखाई दी तब उसने सोचा कि वो शायद अभी स्नान के लिए गई होगी ये सोच कर उसने रुक कर थोडा इंतज़ार किया लेकिन उसकी सास नहीं आई तब उसने वहाँ आस पास के लोगो से पूछा तो उन्होंने कहा कि इस झोपडी में तो उन्होंने किसी भी औरत को नहीं देखा तब वो उस झोपडी के अन्दर गया तो  उसे वहाँ लड्डू का खाली बर्तन  मिला और वही पर उसे एक चुहिया भागती हुई दिखाई दी, जब उसने उस चुहिया को पकड़ा तो वो चुहिया झट से उसके पास आ गई और तब वो उसी खाली बर्तन और उस चुहिया को ले कर अपनी पत्नी पास गया और ले जा कर उसने वो चुहिया अपनी पत्नी को दे दी और कहा कि यही तुम्हारी माँ है !
पहली औरत ने धर्म भी निभाया  और कर्म भी लेकिन दूसरी औरत ने धर्म तो निभाया पर कर्म नहीं, वो रोज़ गंगा सनान करती रही लेकिन उसका कर्म उसके धर्म के आगे हार गया ! तो इसका क्या मतलब हो सकता है धर्म बड़ा या कर्म ????

10 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. aap ki baat ek dam satya hai.
    sundar rachna ke liye badhaiyan.
    mughe aapki rachna me karm ki mahtta jyada dikhi.

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  3. जागरण जंक्शन पर आपकी पोस्ट पर प्रतिक्रियायों को पढ़ कर यहां चला आया. यहा आपने काफी बढिया लिखा है. आप अपनी इस पोस्ट को जंक्शन पर भी डालें ताकि इसका लाभ अन्य लोगों को भी मिल सके.

    मेरा जंक्शन पर यूआरएल है:

    rkpandey.jagranjunction.com

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  4. धर्म बड़ा या कर्म ???? ....कर्म

    __________________
    ______________
    'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है !!

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  5. बहुत खूब .......आपने इस कहानी के द्वारा ये बतला दिया कि धर्म से बड़ा कर्म है ........उम्दा प्रस्तुती .

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  6. इस प्रेरक कथा को पढ़कर तो यही कहना पड़ेगा कि
    ..जैसा कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान.

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  7. bahut sundar udaharan diya...dham nibhana hai to pehle apne karmon ka nirvaahan karo...

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  8. इस कहानी को समझो पहले फिर धर्म बड़ा की कर्म उसकी बात करो |
    पहली बुढिया धर्म करने कुम्भ मेले में गयी |
    क्यूंकि अब उसकी उम्र कम है |
    धर्म से उसने गंगा स्नान किया |
    धर्म से उसने आये अतिथि को भोजन दिया |
    अतिथि को देने के बाद भी तो उसके पास लड्डू बचे थे वह बचे लड्डू खा सकती थी |
    किन्तु उनसे नहीं खाया |
    और यह सिलसिला चलता रहा |
    वह वहां पर धन के लालच में धर्म करने नहीं गयी थी |
    वह गयी थी की अब यह जनम तो गया अब अगले जनम की तयारी करनी है |
    और जो उसकी बहू थी तो उसने कर्म किया धर्म नहीं |
    उसने कर्म से उसे लड्डू बना कर दिए |
    किन्तु धर्म कहता है की बड़ों की सेवा करनी चाहिए वह उसने नहीं की |
    कर्म तो किया पर अनमने ढंग से |
    किन्तु बुढिया ने धर्म किया तो उसके कष्ट को उस धर्म ने उठा लिया |
    जो प्रतिदिन अतिथि बनकर आता था |
    और उस बुढिया को जो धन मिला वह उसके धर्म का आशीर्वाद था |

    दुसरी तरफ जो बहु की माँ थी वह कर्म करने गयी थी धर्म करने नहीं |
    उसकी पूरी योजना थी की वहां रहकर धन लाना है |
    उसे धर्म का तो पता ही नहीं था |
    किन्तु धर्म फिर भी आया अतिथि बनकर |
    जो उसने उसे कुछ नहीं दिया |
    तो कर्म के कारण वह बुढिया लड्डू खाने वाले चुहिया बन गयी |
    जो धर्म ने उसे इसी जन्म में बना दिया |

    अब रही बात धर्म और कर्म की |
    धर्म वह जो ध्यान से निकलता है |
    कर्म वह तो इच्छा से निकलता है |

    पहली बुढिया कुम्भ में ध्यान करें गयी थी न की इच्छा की पूर्ती करने के लिए |
    दूसरी बुढिया कुम्भ में इच्छा की पूर्ती के लिए गयी थी न की ध्यान करने |

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