रविवार, अगस्त 29, 2010

चलती फिरती ब्लोगिंग !!!

जब से इस ब्लॉग जगत में कदम रखा है इस ब्लोगिंग के कीड़े ने ऐसा काटा है की हर तरफ बस ब्लॉग नज़र आते है मतलब की जहां भी कुछ लिखा दिखे उसे पढ़ कर कमेन्ट देने की इक्छा प्रबल होने लगती है ! अब चाहे  वो पूरा ब्लॉग हो या फेसबुक और ट्विटर जैसी  साईट पर किसी का स्टेटस या फिर किसी की लिखी चार लाइने,  लेकिन ये सब तो रही इन्टरनेट की बात लेकिन उसका क्या जो हमारे आस पास चलते फिरते ब्लॉग घूमते है !
अभी पिछले दिनों दिल्ली से बाहर जाना हुआ बाढ़ के डर से नहीं किसी ज़रूरी काम से और बस वही हाइवे पर नज़र आए ये एक के बाद एक चलते फिरते ब्लॉग ! हाइवे से गुजरते हुए रास्ते में कई ट्रक और मिनी ट्रक और टेम्पो आदि देखे जिन पर लिखी लाइने किसी माइक्रो ब्लोगिंग से कम नहीं थी ! वैसे उन सभी को पढ़ कर आज की सबसे प्रचलित माइक्रो  ब्लोगिंग साईट ट्विटर की याद आ गयी वास्तव में इन ट्रक वालो ने तो चलता फिरता ट्विटर ही खोल रखा है और ट्विटर इसलिए क्योकि जिस तरह ट्विटर पर अपनी बात कहने के लिए आपके पास 140 शब्दों की सीमा होती है उसी तरह ये भी अपनी बात कुछ शब्दों में ही कह देते है ! अब मैंने इनकी चलती फिरती ब्लोगिंग में जो कुछ भी पढ़ा वो बड़ा ही रुचिपूर्ण और असरकारक लगा ! आप भी पढ़िए
तेरे यार दा ट्रक (तेरे पास कैसे आया)
जट दी मर्सिडीज़ (नीले रंग की)
13 मेरा 7 (?????)
चल मेरी रानी कम पी इराक का पानी (मैंने तो सुना था गाड़िया डीज़ल और पेट्रोल से चलती है)  
जट रिस्की आफ्टर विस्की ( हा हा हा )
सत्येन्द्र का सत्तू (पता नहीं कहा मिलेगा)
दिल 20 तेरा 80 20  तेरे ( वाह वाह वाह )
यो तो ऐसे ही चाल्लेगी ( चला चला आगे तेरा मामा तेरा इंतजार कर रहा है )
अनारकली भर के चली (बदबूदार कूड़ा)
यारां दा टशन ( बजाएगा मामा का बैंड )
वजन घटाए सिर्फ 45 दिनों में (जय हो बाबा रामदेव )
सोनू मोनू दी गड्डी (तो सोनू मोनू कहाँ है)
बुरी नज़र वाले तेरा मुहँ कला ( कोई नी जी फेयर एंड लवली है ना )
होर्न प्लीज़ ( सॉरी, होर्न ख़राब है )
फिर मिलेंगे (इस बारे में सोचा जायेगा )
तो ये थी मेरी चलती फिरती ब्लोगिंग अरे नहीं मेरी नहीं उन ट्रक वालो की जिन्हें मैंने पढ़ा लेकिन कमेन्ट यहाँ किया ! वैसे ऐसी चलती फिरती ब्लोगिंग पढ़ कर समय कब कट गया पता ही नहीं चला ! आपने भी ऐसी ही चलते फिरते ब्लॉग देखे होंगे,  तो ज़रा आप भी बताईये अपने कमेन्ट के साथ !

शुक्रवार, अगस्त 13, 2010

आज़ादी या सरकारी छुट्टी ???

15 अगस्त 1947  ये वो दिन था जब हमारा "भारत" आज़ाद हुआ और हमें अग्रेज़ी हुकूमत से आज़ादी मिली ! "आज़ादी", क्या है ये आज़ादी ? क्या मतलब होता है देश की आज़ादी का ? ये प्रश्न इसलिए क्योकि मैंने अग्रेज़ी हुकूमत की गुलामी नहीं देखी, देखा है तो सिर्फ आज का भारत जिसे आज़ाद(?) कहा जाता है ! मुझे नहीं पता की जब भारत गुलाम था तब वो कैसा था ? उस वक़्त के लोगो का गुलामी को लेकर क्या मनोभाव था ? उस वक़्त लोग किस हद तक अपने देश से प्यार करते थे ? उस वक़्त का  गुलामी का मंजर कैसा रहा होगा ? कितना जूनून था लोगो में अपने देश की आज़ादी को लेकर ? लोग किस कदर देश की आज़ादी के लिए अपना खून बहाने के लिए तत्पर थे ? माँए, कैसे अपने बेटो को अपने देश के लिए शहीद होने के लिए भेज दिया करती थी ? ये और इस जैसे और ना जाने कितने ही प्रश्न आज मन में उठते है क्योंकि मैंने गुलाम भारत नहीं देखा ! देखा है तो सिर्फ आज का भारत, जो की में अब देख भी रही हूँ  ! 
भारत को मिली आज़ादी  के बारे में सिर्फ वही सब जानती हूँ जो अब तक किताबो और अखबारों में पढ़ा फिल्मो में देखा  और बुजुर्गो से सुना है (और उपरवाले से ये प्रार्थना करती हूँ की फिर कभी वो मंज़र ना देखने पड़े !) उस सब पर यकीं करते हुए कहती हूँ की भारत वास्तव में एक सोने की चिड़िया हुआ करता था जहां की मिटटी सोना उगलती थी, सभी में आपसी भाई चारा था, तब हर कोई अपने देश से  प्यार करता था, अपनी आज़ादी को जीता था, भारत की आज़ादी के लिए जो शहीद हुए, तब उन्हें भगवान से कम नहीं आँका जाता था !  सभी लोग 15 अगस्त को लाल किले पर होने वाले समारोह को कोसो दूर से पैदल चल कर देखने आया करते थे ! ये था आज़ादी का वो जूनून जो बिना किसी लागलपेट के बिना किसी स्वार्थ  के सभी के अन्दर था ! ये था, वो आज़ाद भारत जिसे सोने की चिड़िया  कहा जाता था,  लेकिन  मेरे लिए तो ये  सब एक सपने जैसा ही है !
अब अगर आज के भारत की बात की जाए तो आज आज़ादी के जश्न का मतलब ही ख़त्म हो गया ! आज 15 अगस्त और 26  जनवरी जैसे दिन सिर्फ एक सरकारी छुट्टी से बढ़ कर और कुछ नही है  ! आज जब घर के बड़ो से  आज़ाद भारत की कहानी सुनती हूँ तो उस भारत और आज के भारत में एक फर्क देखने लगती हूँ क्योंकि मेरे लिए आज़ादी के बाद का भारत और आज का भारत,  जो की आज़ाद (?) कहलाता है दोनों में फर्क है !
भारत को तो आज भी सोने की चिड़िया कहा जा सकता है क्योकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और वो आज भी कृषि उत्पादन में विश्व पटल पर छाया हुआ है ! कम ही लोग जानते होंगे की भारत आज गेंहू उत्पादन में विश्व में दूसरे स्थान पर है और चावल के उत्पादन में भी भारत विश्व में दूसरे स्थान पर है ! विश्व में चावल और गेहूं जैसे आधारभूत अनाज के उत्पादन में  दूसरा स्थान प्राप्त करने के बाद भी आज भारत में कितने ही ऐसे लोग है जो भर पेट भोजन के लिए भी तरसते है और कितने ही ऐसे लोग है जिन्हें साफ़ सुथरा अनाज मिलता होगा ?? आज सडको चोराहो पर ना जाने कितने ही छोटे बच्चे हाथ फैलाए खड़े नज़र आते है !
ये उस भारत के हाल है जहां की मिटटी आज भी सोना उगलती है लेकिन अफ़सोस ये है की वो सोना सही हाथो  में नहीं पहुँच पाता ! ये अनाज जब खेतो से निकल कर सरकारी मंडियों से होता हुआ जब लोगो तक पहुँचता है तो उसमे से ज्यादातर अनाज तो सड़ चुका होता है और निर्यात करने के बाद जो थोडा बहुत साफ़ सुथरा अनाज बचा होता है उसकी कीमत कहीं ज्यादा होती है ! हमारे  देश में  कितने ऐसे लोग है जो गेहूं और चावल के इतने बड़े उत्पादक देश के वासी होने पर भी बासमती चावल और शुद्ध गेहूं का आटा खरीद पाते है ??
इसके अलावा भी भारत में आज भी कई ऐसी खूबियाँ है जिनके लिए हम भारत के कृषि उत्पादन का शुक्रिया अदा कर सकते है ! आज भारत ना सिर्फ गेहूं बल्कि कपास  और चीनी के उत्पादन में विश्व में तीसरे स्थान पर है लेकिन यहाँ भी यही हाल है ! ना तो किसी को साफ़ और उचित मूल्य पर चीनी मिल पाती और ना ही ऐसा कभी हुआ की कपास के इतने बड़े उत्पादक होने पर भी सर्दियों में ठण्ड से किसी की जान ना गयी हो ! आखिर इस सब की वजह क्या है ? क्यों हम लोग अपने देश की इन खूबियों को जी नहीं पाते है ! इसका एक ही जवाब होगा और वो है भ्रष्टाचार, जिसमे हमारे  देश ने विश्व में  84 वां स्थान प्राप्त किया है ! लेकिन जिस गति से ये भ्रष्टाचार अपने पैर फैला रहा है उससे तो यहीं डर है कि कहीं 84 का आंकड़ा उल्टा ना हो जाये !
ये है हमारे आज़ाद भारत का एक छोटा सा सच ! आज जो हालात देश के है और जिस क़र्ज़ में हमारा देश डूबता जा रहा है और जिन लोगो के हाथ में देश की कमान है उसके आधार पर कह सकते  है की देश ना तो राजनितिक रूप मे आज़ाद है और ना ही आर्थिक रूप में और आज की जो राजनितिक स्थिति  है उससे तो यही लगता है की देश शायद फिर से गुलाम हो जायेगा ! लेकिन क्या इसके लिए सिर्फ हमारे देश के भ्रष्ट नेता और हमारा कमजोर प्रशासन ही जिम्मेदार है ??? आज भी कश्मीर और राम मंदिर जैसे मुद्दे राजनेताओ की सियासी रोटियां सेकने के काम आते है ! ये वो मुद्दे है जो अगर सुलझ गए तो नेताओ का वोट मांगने का जरिया ख़त्म हो जायेगा !
लेकिन  इसमें गलती सिर्फ इन नेताओ की तो नहीं है ! जब भी भ्रष्टाचार की बात आती है तो लोग अक्सर सफेदपोशो और खाकी वर्दी को कोसने लगते है कि इन्होने देश का सत्यानाश कर दिया ! ये देश को फिर से विदेशी ताकतों का गुलाम बना देंगे ! इन्होने ऐसा कर दिया वैसा कर दिया ये कर दिया वो कर दिया वगेरह-वगेरह ! लेकिन एक बार खुद से पूछ कर देखिये क्या हम सभी अपने देश के लिए समर्पित है ??? क्या हमारे अन्दर आज़ाद भारत की आज़ादी का जश्न बनाने का जज्बा है ??? क्या हम 15 अगस्त के अलावा कभी और अपने शहीदों  को याद कर पाते है ?? क्या हमने कभी कोई भ्रष्ट काम नहीं किया ?? क्या हमने कभी किसी को रिश्वत नहीं दी ?? क्या हमने कभी अपने गलत काम को सही करवाने के लिए सिफ़ारिशो और नोटों  का सहारा नहीं लिया ??? ऐसे और भी ना जाने कितने ही सवाल है जिनके जवाब शायद नहीं में ही होंगे  और शायद ही क्यों पक्का होंगे  ! चलिए "गाँधी जी" की कही बात को याद करते है उन्होंने कहा था "जब हम किसीपर एक ऊँगली उठाते है  तो बाकी की तीन उँगलियाँ हमारी  तरफ ही होती है !" इसके अलावा ये भी सुना ही होगा "स्वयं को सुधारो, जग सुधरेगा !" वैसे ये सब तो में अपने एक पूर्व लेख में भी कह चुकी हूँ ! जिसमे एक कमेन्ट जो  "आशीष" जी के नाम से आया था उसमे उन्होंने बड़े ही खुले अंदाज़ में अपने जुगाड़ लगाने की बात कबुली थी !
आज हमारे समाज में कई लोग ऐसे है जो इन सब चीजों  का सहारा लेते है और कोस देते है सिस्टम को लेकिन हम ये भूल जाते है कि इस सिस्टम को ऐसे बनाने वाले भी हम लोग ही है इन नेताओ का चदावा चडाने वाले भी  हम लोग ही है और कह देते है कि छोड़ो यार जैस चल रहा है चलने दो अपना काम तो हो रहा है ना बस और  क्या चाहिए ! कहीं  बम  ब्लास्ट  हो जाये  तो पहले  अपने  लोगो  कि खैर  खबर  ले  लो  वो  सब तो ठीक  है ना और जब  सभी  के ठीक  होने  कि खबर  मिल जाती  है तो यहीं  कहते  है शुक्र  है हम बच  गए  ! लेकिन कब   तक  ??? आज तो हम बच गए  क्या ये  ज़रूरी  है कि कल  किसी  और बम  ब्लास्ट  में भी हम बच  जाए  ! क्या इस आतंकवाद  को जड़  से ख़त्म  करने  में हमारी  कोई  भूमिका  नहीं  है  ??  मेरी  नज़र  में ये है हमारे   आज  के  आज़ाद  भारत कि कहानी जहां हर कोई एक दूसरे पर दोष   मड देता  है लेकिन कोई भी खुद  को सुधारने  कि कोशिश  नहीं  करता  !
आज हमारे भारत  को फिर  से आज़ादी की ज़रूरत  है और वो  आज़ादी हमें भ्रष्टाचार, आतंकवाद , घोटालो , बड़ते  अपराध , बढती  हुई  महगाई  कश्मीर और राम मंदिर जैसी और भी कई समस्याओं  से तो  चाहिए लेकिन उस  सबसे  पहले  हमें अपनी  छोटी  मानसिकता  से आज़ादी चाहिए ! जो इन सियासतदारो को  अपनी गन्दी सोच और अपनी घटिया सियासत चलाने  का मौका देती है तो उठाईये   आज़ादी कि तरफ  कदम  माना  की मुश्किल  है लेकिन नामुमकिन   तो नहीं  ! कब तक बैठे के इन मंत्रियो के सहारे ??
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मंगलवार, अगस्त 03, 2010

अभी तो मुजरा शुरू हुआ है !

कुछ हफ्ते पहले एक फिल्म  आई थी "राजनीति" जिसमे   वर्तमान राजनीति को दिखाने की कोशिश की गयी थी और अब पिछले हफ्ते एक फिल्म आई थी "खट्टा मीठा", इस फिल्म में पी डब्ल्यू डी और एम् सी डी जैसे विभागों के काम करने के तरीके को दिखाया गया है इस फिल्म में अक्षय कुमार ने एक बड़ा ही सटीक डायलोग बोला है  कि " पैसा दो तो पुलिस मुजरा भी करेगी" तो लीजिये हो गया मुजरा शुरू ! अभी तो कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू भी नहीं हुए  और सभी विभागों ने अपना-अपना मुजरा शुरू कर दिया ! सभी की कारगुजारिया धीरे-धीरे  करके बाहर आने लगी है और ये तो होना ही था भई, ये भारत  देश है जहां सौ में से नब्बे  बेईमान का नारा लगता है , तो इतना बड़ा करोडो का गेम्स प्रोजेक्ट आखिर शराफत से कैसे संपन  हो सकता  है घपला तो होना ही था लेकिन उस घपले की पोल गेम्स से ही पहले खुल जाएगी ये  अंदाजा कम ही था, लेकिन इसकी भविष्यवाणी हमारे "चैतन्य" भाई मेरी पिछली पोस्ट "अच्छा, महंगा ..................हमारा शहर दिल्ली !" पर कर चुके थे !  हालांकि उनकी ये भविष्यवाणी  बारिश से होने वाली समस्याओं को लेकर थी !

खैर, अभी तो मुजरा शुरू ही हुआ है वैसे मुजरा तो लगभग आज हर सरकारी और गैरसरकारी विभाग करता है लेकिन इस मुजरे के पीछे किसका हाथ है ये खुलने में समय लगता है और समय भी इतना की एक पूरी नस्ल जवान हो जाये और यहाँ भी यही होने वाला है ! अभी बहुत से ऐसे लोग है जिन्होंने खा कर डकार भी नहीं मारी है बल्कि उनका खाना पीना अभी चालू ही है या अगर अक्षय के स्टाइल में ही कहूँ तो उनके मुजरे तो अभी चालू है और अब इन मुजरो से सबसे ज्यादा परेशानी उस पक्ष (विपक्ष) को होने वाली है जिसे ये मुजरा करने को नहीं मिला और अब शुरू होगा पक्ष और विपक्ष का कोमन्वेल्थ गेम, जिसका नतीजा तो ऊपरवाला ही जाने या फिर धरती पर बैठा कोई ज्ञानी !  मैं अज्ञानी तो इसका नतीजा नहीं बता सकती !
अब हर कोई, क्या जनता और क्या नेता, वो सब जो इस मौके की तलाश में ही थे कि कब मौका मिले और वो कब चौका मारे तो उनकी तो इस घपले कि खबर सुन कर बाछे ही खिल गयी ! अरे भई, अंधे को क्या चाहिए दो आँखे, सो मिल गयी ! जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों की शुरुवात तो हो चुकी है ! अब देखना ये है कि ये खेल उस खेल से कितना लम्बा चलता है ! गेम्स तो कुछ दिन में निबट जायेंगे  लेकिन ये "खेल" तो पीढ़िया देखेंगी !
इन "खेलो" की भनक शायद इतनी जल्दी नहीं लगती अगर इंद्र देवता मेहरबान ना होते क्योकि बारिश ने ही घटिया मेटेरियल की पोल खोली है ! कहीं स्टेडियम स्विमिंग पुल में तब्दील हो चुके है तो कहीं की टाइले उखड-उखड कर खिलाडियों को ज़ख़्मी करने लगी है ! कहीं वर्ल्ड क्लास स्टेडियम का दर्ज़ा पाने वाले स्टेडियम की छत टपकने लगी है तो कहीं के हाई क्लास रोड तालाब बनगए है और ये सब तब है जबकि इन प्रोजेक्टों को पूरा करने के लिए कई वर्ल्ड क्लास  विदेशी कम्पनियों को टेंडर दिए गए थे ! कल ट्विटर पर जूनियर बच्चन  ने एक ट्विट पोस्ट की "कोई तो बारिश बंद करवाओ वर्ना कोमनवेल्थ कमिटी को स्विमिंग पुल बनाने की ज़रूरत नहीं होगी क्योकि उसके लिए सड़के ही काफी होंगी !"  दिल्ली की हालत देख कर तो कई लोग सोशल नेटवर्किंग साईट पर अपने स्टेटस में ये कहने लगे है कि "दिल्ली किस मुहँ से बारिश होने की दुआ कर रही है !" अभी कुछ दिन पहले एक मंत्री ने अपने कोमनवेल्थ गेम्स को लेकर  ब्यान में ये दुआ  मांगी कि " भगवान् गेम्स के दौरान इतनी बारिश हो कि गेम्स बर्बाद हो जाये !" अब अगर सता के गलियारों में बैठे ये नेता गण अपने फायदे के लिए साफ़ तौर पर देश की इज्ज़त की धज्जियाँ उड़ने के ख्वाब देखेंगे तो बेचारी जनता अपना सहयोग क्यों देगी !
इन "खेलो" कि खबर लीक होने से एक सबसे बड़ा फायदा  या नुक्सान ये हुआ कि  2019 में होने वाले एशियाड खेलो के लिए भेजी जाने वाली दावेदारी सरकार कि तरफ से नामंजूर होने की गंध आने लगी है ! हालाँकि इन घपलो पर "शीला" सरकार और कोमनवेल्थ गेम्स के चेयरमेन "सुरेश कलमाड़ी" ये चीख-चीख कर कह रहे है की कोई घपला  नहीं हुआ और उनके पास सारा हिसाब मौजूद है लेकिन क्या आप इस पर विश्वास करेंगे ??? अभी तो सिर्फ धुआं उठना शुरू हुआ है लेकिन आग तलाशनी बाकि है ! क्या लगता है उस आग तक पहुचने में कितना समय लगेगा ??? या फिर उस आग तक पहुंचा ही नहीं जा सकेगा ! चलिए एक और प्रश्न का जवाब तलाशते है !