मुझे नियमित रूप से पढने वालो को पता होगा की मैंने अपनी एक पोस्ट में एक व्यंग्य लिखा था ! जिसका शीर्षक था, "नेता जी की नरक यात्रा" ! ये हास्य व्यंग्य लिखा तो मैंने था लेकिन इसकी मूल रचनाकार मैं नहीं थी ! ये बात मैं तब बता चुकी थी !
मेरी आदत है की कुछ भी अच्छी लाइन या कोई अच्छा वालपेपर या फिर अपनी ही कोई चुनिन्दा पोस्ट को मैं अपने फेसबुक अकाउंट पर अपडेट कर देती हूँ और यहीं मैंने इस हास्य व्यंग्य के साथ भी किया और वहाँ भी कमेन्ट आने शुरू हो गए ! तब वहाँ भी मुझे अपनी सफाई देनी पड़ी और यही हाल जागरण जक्शन पर भी हुआ ! खैर अब वो बात ख़त्म हो चुकी थी ! लेकिन जब मैंने अपनी आदत अनुसार एक वालपेपर अपने फेसबुक अकाउंट पर अपडेट किया तो फिर से वही सब पिछला शुरू हो गया ! लोगो के कमेन्ट आने शुरू हुए ! सभी ने मेरे उस लिखने की शेली की तारीफ की जो मेरे लिए टेढ़ी खीर है ! आप भी इस वालपेपर पर एक नज़र डालिए !
इसे लिखने में किसका दिमाग है मुझे पता नहीं ये तो मैंने गूगल से डाऊनलोड किया था ! वैसे भी ऐसा कुछ लिखने की कला मुझमे नहीं है ! लेकिन वहीँ अपना पुराना राग की अगर कुछ अच्छा लगता है तो उसे पोस्ट कर देती हूँ और जब इस वालपेपर को अपडेट करने के बाद एक बार फिर से सभी को ये बताना पड़ा की ये मैंने नहीं लिखा !
इसलिए अब तय किया हैं कि जब भी ऐसा कुछ हास्यपूर्ण पढूंगी तो रचनाकार के नाम के साथ सीधा लिंक ही पोस्ट कर दूंगी ! तो इसी के चलते आज एक लिंक दे रही हूँ इस कहानी के लेखक और नायक है श्री आर. के. खुराना जी ! आप भी एक नज़र डालिए इनकी कहानी पर !
बेशक, मैं खुद तीखा लिखती हूँ लेकिन मुझे हास्य पढना ज्यादा पसंद है और अक्सर ऐसा कुछ तलाशती रहती हूँ ! इस कारण ही मैं खुद कुछ हास्य कवियों और कार्टूनिस्ट कलाकारों को फोलो भी करती हूँ ! ऐसे ही हास्य की तलाश में मैंने श्री सचिन देव जी बाउंसर पढे ! बाउंसर ऐसे की कोई भी क्लीन बोल्ड हो जाये ! इनके बाउंसर में एक नाम मेरा भी था तो आप भी पढ़िए की किस तरह इन्होने अपने चोथे बाउंसर में मेरे नाम और मेरे ब्लॉग teekha bol को क्लीन बोल्ड किया !
हालाँकि उनके ये बाउंसर ११ जून को फैके गए थे लेकिन मेरी लेटलतीफी की हद देखिये कि मेरा इनसे सामना ३ जुलाई को हुआ या यू कहे कि इनके बाउंसर मुझ तक पहुचने से पहले थक गए ! वैसे जवाबी कारवाही तो मैंने भी कर दी ! लेकिन फिर भी इन लाज़वाब बाउंसर के आगे टिकना थोडा मुश्किल ही लगा !
तो आज आप सभी हंसिये अगली बार अपने तीखे बोल के साथ जल्द ही मिलूंगी ! वैसे भी इस बार आने में थोड़ी देर हो गई !
रविवार, जुलाई 04, 2010
गुरुवार, जून 17, 2010
कब बदलेगी ये "इज्ज़त" की सोच ????
कल के अखबार में एक खबर पढ़ी, खबर दिल्ली के स्वरूप नगर की थी जिसमे एक लड़का और एक लड़की शादी करना चाहते थे मतलब प्रेम विवाह ! अपने घर वालो की मर्जी से, लेकिन जब लड़का, लड़की के घर अपनी शादी की बात करने गया तो लड़की के घर वालो ने लड़के को बुरी तरह पीटना शुरू कर दिया और ये देख कर जब लड़की ने लड़के को बचाने की कोशिश की तो उन लोगो ने लड़की को भी पीटना शुरू कर दिया ! पीटते-पीटते भी जब उनका मन नहीं भरा तो उन्होंने दोनों को लोहे के ट्रंक में डाल कर उन्हें तब तक बिजली का करंट दिया जब तक वो मर नहीं गए ! आज उन दोनों को मारने वाले लड़की के ताऊ और लड़की के पिता दोनों की पुलिस की गिरफ्त में है !और दोनों में से किसी को भी अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है !
अब दूसरी खबर .........अभी कुछ दिन पहले की ही बात जब एक युवक और एक युवती ने गंगनहर में कूद कर जान दे दी और यहाँ भी वजह वही थी दोनों शादी करना चाहते थे लेकिन दोनों के शायद घरवाले इस बात से राज़ी नहीं थे !
ऐसी और ना जाने कितनी ही घटनाएं हम रोज़ अखबारों में पदते है और अपने आस-पास देखते है ! इन सभी घटनाओं में सिर्फ एक ही चीज़ उभर कर आती है और वो है घर की इज्ज़त ! जिसके लिए माता-पिता अपने ही बच्चो का क़त्ल करने से नहीं हिचकते ! अभी पिछले दिनों ही 'निरुपमा' का केस सामने आया जिसकी चर्चा मैं अपने ही एक पूर्व लेख में कर चुकी हूँ !
आखिर माँ-बाप अपनी ही बेटी का क़त्ल कैसे कर सकते है ??? वो भी उस बेटी का ------
जिस बेटी को एक माँ ने अपने ढूध से सीचा,
जिस बेटी की ऊँगली पकड़कर पिता ने उसे चलना सिखाया,
जिसकी उंगलियों ने अपने भाई की कलाई को राखी से सजाया,
जिसकी एक मुस्कराहट ने पिता का हर गम दूर किया,
जिसकी गूंजती किलकारी ने माँ के होटो पर एक मुस्कान बिखेरी,
जिसे कभी पिता ने अपने घर की रौनक कहा,
जिसकी मासूम शरारतो ने भाई को हंसाया तो कभी परेशान किया,
जिसकी एक छोटी सी ख्वाइश पर भी पिता ने अपना सब कुछ वार दिया,
जिसकी हर पसंद नापसंद को पिता ने अपनी पसंद नापसंद बनाया,
जिसकी एक छोटी सी आह पर पिता ने दुनिया सर पर उठा ली,
जिसे पिता ने कभी अपने जीने की वजह बताया,
जिसकी हर सांस से माता-पिता ने अपनी हर सांस जोड़ ली,
जिसकी चंचलता ने माता-पिता को प्रफुल्लित कर दिया,
जिस पिता के आँगन में खेल कर वो बड़ी हुई,
उसकी एक चाहत ने ऐसा क्या कर दिया कि,
"एक पिता अपनी ही बेटी का कातिल बन गया"
स्वरुप नगर कि घटना में अपनी ही बेटी का क़त्ल करने के बाद एक पिता और एक ताऊ को (जो मेरी नजरो में पिता समान ही है) उन्हें अपने किए पर कोई पछतावा नहीं ! क्या ये सब करने के बाद वो दोनों पिता कहलाने लायक है ??
हमेशा से सुनती आई हूँ कि माता-पिता अपने बच्चो के लिए कुछ भी कर सकते है ! किसी भी माता-पिता के जिंदगी कि सबसे बड़ी चाहत अपने बच्चो को खुश देखना ही होती है ! लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है ???
किस इज्ज़त और किस समाज के लिए वो ऐसा कुक्र्त्य करते है !
क्या इज्ज़त, अपने ही जन्म दिए बच्चो कि ख़ुशी से बढकर है ???
अगर माता-पिता को कुछ वास्तव में गलत लगता है तो बच्चो को समझाया भी जा सकता है उन्हें उनकी गलतियों से अवगत भी कराया जा सकता है, लेकिन शायद नहीं क्योकि माता-पिता अक्सर अपने बच्चो के प्रश्नों का ना तो जवाब देना चाहते और ना ही उन्हें समझना चाहते, उन्हें ये पसंद ही नहीं कि उनके बच्चे कोई फैसला ले या फिर वो अपनी पसंद का जीवनसाथी चुन सके और शायद इसलिए ही माता-पिता के पास अपने बच्चो की पसंद को खारिज कर उन्हें मौत के घाट उतारने में भी कोई हिचक महसूस नहीं होती ! बल्कि अपने किए हुए ऐसे नरसंहार को वो गर्व से सही भी ठहराते है ! हाँ भई, तो क्या हुआ बच्चे जिंदा नहीं है उनकी इज्ज़त तो जिंदा रह ही जाती है ! जिसे शायद वो ताउम्र अपने गले से लगा कर सके ! शायद यही इज्ज़त उन्हें हर ख़ुशी दे सके, शायद यही इज्ज़त उनके जीवन का सहारा बन सके, और शायद यही इज्ज़त उनकी आखिरी सांस में उन्हें सहारा दे सके !
ओनर किलिंग पर लिखे अपने पिछले लेख की ही तरह आज एक बार फिर से हार मान गई ! माता-पिता की सोच शायद बच्चो की बली दे कर ही बदलेगी लेकिन इस सोच को बदलने के लिए और कितनी बलीया देनी पड़ेंगी ???
अब दूसरी खबर .........अभी कुछ दिन पहले की ही बात जब एक युवक और एक युवती ने गंगनहर में कूद कर जान दे दी और यहाँ भी वजह वही थी दोनों शादी करना चाहते थे लेकिन दोनों के शायद घरवाले इस बात से राज़ी नहीं थे !
ऐसी और ना जाने कितनी ही घटनाएं हम रोज़ अखबारों में पदते है और अपने आस-पास देखते है ! इन सभी घटनाओं में सिर्फ एक ही चीज़ उभर कर आती है और वो है घर की इज्ज़त ! जिसके लिए माता-पिता अपने ही बच्चो का क़त्ल करने से नहीं हिचकते ! अभी पिछले दिनों ही 'निरुपमा' का केस सामने आया जिसकी चर्चा मैं अपने ही एक पूर्व लेख में कर चुकी हूँ !
आखिर माँ-बाप अपनी ही बेटी का क़त्ल कैसे कर सकते है ??? वो भी उस बेटी का ------
जिस बेटी को एक माँ ने अपने ढूध से सीचा,
जिस बेटी की ऊँगली पकड़कर पिता ने उसे चलना सिखाया,
जिसकी उंगलियों ने अपने भाई की कलाई को राखी से सजाया,
जिसकी एक मुस्कराहट ने पिता का हर गम दूर किया,
जिसकी गूंजती किलकारी ने माँ के होटो पर एक मुस्कान बिखेरी,
जिसे कभी पिता ने अपने घर की रौनक कहा,
जिसकी मासूम शरारतो ने भाई को हंसाया तो कभी परेशान किया,
जिसकी एक छोटी सी ख्वाइश पर भी पिता ने अपना सब कुछ वार दिया,
जिसकी हर पसंद नापसंद को पिता ने अपनी पसंद नापसंद बनाया,
जिसकी एक छोटी सी आह पर पिता ने दुनिया सर पर उठा ली,
जिसे पिता ने कभी अपने जीने की वजह बताया,
जिसकी हर सांस से माता-पिता ने अपनी हर सांस जोड़ ली,
जिसकी चंचलता ने माता-पिता को प्रफुल्लित कर दिया,
जिस पिता के आँगन में खेल कर वो बड़ी हुई,
उसकी एक चाहत ने ऐसा क्या कर दिया कि,
"एक पिता अपनी ही बेटी का कातिल बन गया"
स्वरुप नगर कि घटना में अपनी ही बेटी का क़त्ल करने के बाद एक पिता और एक ताऊ को (जो मेरी नजरो में पिता समान ही है) उन्हें अपने किए पर कोई पछतावा नहीं ! क्या ये सब करने के बाद वो दोनों पिता कहलाने लायक है ??
हमेशा से सुनती आई हूँ कि माता-पिता अपने बच्चो के लिए कुछ भी कर सकते है ! किसी भी माता-पिता के जिंदगी कि सबसे बड़ी चाहत अपने बच्चो को खुश देखना ही होती है ! लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है ???
किस इज्ज़त और किस समाज के लिए वो ऐसा कुक्र्त्य करते है !
क्या इज्ज़त, अपने ही जन्म दिए बच्चो कि ख़ुशी से बढकर है ???
अगर माता-पिता को कुछ वास्तव में गलत लगता है तो बच्चो को समझाया भी जा सकता है उन्हें उनकी गलतियों से अवगत भी कराया जा सकता है, लेकिन शायद नहीं क्योकि माता-पिता अक्सर अपने बच्चो के प्रश्नों का ना तो जवाब देना चाहते और ना ही उन्हें समझना चाहते, उन्हें ये पसंद ही नहीं कि उनके बच्चे कोई फैसला ले या फिर वो अपनी पसंद का जीवनसाथी चुन सके और शायद इसलिए ही माता-पिता के पास अपने बच्चो की पसंद को खारिज कर उन्हें मौत के घाट उतारने में भी कोई हिचक महसूस नहीं होती ! बल्कि अपने किए हुए ऐसे नरसंहार को वो गर्व से सही भी ठहराते है ! हाँ भई, तो क्या हुआ बच्चे जिंदा नहीं है उनकी इज्ज़त तो जिंदा रह ही जाती है ! जिसे शायद वो ताउम्र अपने गले से लगा कर सके ! शायद यही इज्ज़त उन्हें हर ख़ुशी दे सके, शायद यही इज्ज़त उनके जीवन का सहारा बन सके, और शायद यही इज्ज़त उनकी आखिरी सांस में उन्हें सहारा दे सके !
ओनर किलिंग पर लिखे अपने पिछले लेख की ही तरह आज एक बार फिर से हार मान गई ! माता-पिता की सोच शायद बच्चो की बली दे कर ही बदलेगी लेकिन इस सोच को बदलने के लिए और कितनी बलीया देनी पड़ेंगी ???
मंगलवार, जून 08, 2010
नेता जी की नरक यात्रा ...................
एक भ्रष्ट नेता जी, (ईमानदार नेता के साथ भगवान् ऐसा कभी ना करे) की कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई ! ( ऐसा अक्सर होता नहीं है ) मृत्यु के बाद उनकी आत्मा को यमराज एक बड़ी सी लिफ्ट में यमलोक लेकर पहुंचे ! आखिर वीआईपी जो ठहरे, अब भैसे पर तो आम आदमी ही बैठता है ! खैर ......यमलोक पहुचे तो नेताजी से पूछा गया की कहाँ रहना पसंद करेंगे नरक में या स्वर्ग में ???? नेताजी जी सोच में डूब गए की कहाँ रहा जाये ??? तभी एक यमदूत ने उन्हें कहा की आपकी सहूलियत के लिए हम आपको एक-एक दिन दोनों जगह रहने देते है उसके बाद आप फैसला लेना कि कहा रहना है ! नेताजी को बात जँच गई और उन्होंने तुरंत हामी भर दी !
उसके बाद नेताजी को पहले नरक दर्शन के लिए ले जाया गया, उसी बड़ी वाली लिफ्ट में ! लिफ्ट ऊपर जाने लगी , और थोड़ी देर में लिफ्ट में ऊपर पहुँच गई ! जैसे ही लिफ्ट का दरवाज़ा खुला सामने नरक था ! नरक को देखते ही नेताजी की आँखे चोंधिया गई ! बाहर एक बड़ा सा गोल्फ कोर्स बना हुआ था जहां कई लोग गोल्फ का आनंद ले रहे थे, थोडा और अन्दर जा कर देखा तो एक बड़ा सा बीअर बार बना हुआ था जहां नेताजी की पसंद के अनुरूप सभी सुविधाए मोजूद थी ! वही नेताजी के सभी यार दोस्त भी बैठे हुए मिल गए ! नेताजी ने सभी के साथ बड़ा आनंद लिया, और इस तरह एक दिन कब बीत गया नेताजी को पता भी नहीं चला !
अगले दिन फिर से वही यमदूत नेताजी को लेने आ गया ! नेताजी फिर से लिफ्ट में सवार हुए और चल पदे स्वर्ग की ओर ! लिफ्ट थोड़ी ही देर में स्वर्ग पहुँच गई ! जैसे ही नेताजी ने स्वर्ग में प्रवेश किया तो वहाँ देखा की चारो तरफ सत्संग चल रहा है ! लोग ध्यान पूजा में मग्न है ! हर कोई ईश्वर भक्ति में मंत्मुघ्द हुआ बैठा है ! ये सब नेताजी को अच्छा तो लगा पर बहुत अच्छा नहीं ! यहाँ तो नेताजी के लिए एक दिन भी बिताना मुश्किल हो गया ! परेशान नेताजी ने जैसे-तैसे एक दिन काटा ! अगली सुबह फिर से वही यमदूत नेताजी को लेने पहुँच गया ! नेताजी फिर से उस बड़ी वाली लिफ्ट में सवार हुए ! थोड़ी देर में लिफ्ट यमराज के ऑफिस के बाहर रुकी !
अब नेताजी को एक फॉर्म भरने के लिए दिया गया, जिसमे उनसे पूछा गया की वो नरक में रहना पसंद करेंगे की स्वर्ग में ???
नेताजी ने जवाब में लिखा " वैसे तो स्वर्ग अच्छा है लेकिन वहाँ मेरी जान पहचान का कोई भी नहीं है ओर नरक में तो अपने सभी यार दोस्त है ही ओर मेरी पसंद की सभी चीज़े भी है वहाँ मौजूद है, तो इस कारण वश मैं नरक में ही रहना चाहूँगा !" ओर ये लिख कर नेताजी ने अपना फॉर्म जमा कर दिया !
नेताजी की इच्छा को माना गया ओर यमराज ने अपने यमदूत से कहा की इन्हें अगले दिन नरक में भेज दिया जाए ! नेताजी ये सुन कर बड़े खुश हुए !
अगले दिन नेताजी को यमदूत ने फिर से लिफ्ट में बैठाया ओर चल दिए नरक की ओर ! लिफ्ट धीरे-धीरे ऊपर जाने लगी ओर नेताजी की ख़ुशी तेजी से बदती गई ! थोड़ी देर बाद नरक आ गया ओर नेताजी को वहाँ छोड़ा गया ! लेकिन ये क्या नेताजी को तो अचानक गुस्सा आ गया ! उन्हें नरक में ना तो वो गोल्फ कोर्स दिखा ओर ना बीअर बार और ना ही अपने वो सभी दोस्त ! बल्कि आज तो नरक में चारो तरफ गंदगी फैली हुई थी ओर वहाँ सभी लोगो की काम ना करने के कारण पिटाई भी लगाई जा रही थी ! ये देख कर नेताजी घबरा गए ! उन्होंने यमदूत से पूछा, ये सब क्या है ???? कल तो यहाँ बढ ही सुन्दर नज़ारा था ओर आज ये सब क्यों ????
तब यमदूत ने बड़े प्यार से बोला "वो क्या है ना नेताजी कल स्वर्ग ओर नरक के इलेक्शन थे ओर हमें आपका वोट चाहिए था, बस इसलिए ही आपको वो सब्जबाग दिखाया गया था ! अब आप यही रहिये !"
भगवान् नेताजी की आत्मा को शांति दे !!!!!!!
उसके बाद नेताजी को पहले नरक दर्शन के लिए ले जाया गया, उसी बड़ी वाली लिफ्ट में ! लिफ्ट ऊपर जाने लगी , और थोड़ी देर में लिफ्ट में ऊपर पहुँच गई ! जैसे ही लिफ्ट का दरवाज़ा खुला सामने नरक था ! नरक को देखते ही नेताजी की आँखे चोंधिया गई ! बाहर एक बड़ा सा गोल्फ कोर्स बना हुआ था जहां कई लोग गोल्फ का आनंद ले रहे थे, थोडा और अन्दर जा कर देखा तो एक बड़ा सा बीअर बार बना हुआ था जहां नेताजी की पसंद के अनुरूप सभी सुविधाए मोजूद थी ! वही नेताजी के सभी यार दोस्त भी बैठे हुए मिल गए ! नेताजी ने सभी के साथ बड़ा आनंद लिया, और इस तरह एक दिन कब बीत गया नेताजी को पता भी नहीं चला !
अगले दिन फिर से वही यमदूत नेताजी को लेने आ गया ! नेताजी फिर से लिफ्ट में सवार हुए और चल पदे स्वर्ग की ओर ! लिफ्ट थोड़ी ही देर में स्वर्ग पहुँच गई ! जैसे ही नेताजी ने स्वर्ग में प्रवेश किया तो वहाँ देखा की चारो तरफ सत्संग चल रहा है ! लोग ध्यान पूजा में मग्न है ! हर कोई ईश्वर भक्ति में मंत्मुघ्द हुआ बैठा है ! ये सब नेताजी को अच्छा तो लगा पर बहुत अच्छा नहीं ! यहाँ तो नेताजी के लिए एक दिन भी बिताना मुश्किल हो गया ! परेशान नेताजी ने जैसे-तैसे एक दिन काटा ! अगली सुबह फिर से वही यमदूत नेताजी को लेने पहुँच गया ! नेताजी फिर से उस बड़ी वाली लिफ्ट में सवार हुए ! थोड़ी देर में लिफ्ट यमराज के ऑफिस के बाहर रुकी !
अब नेताजी को एक फॉर्म भरने के लिए दिया गया, जिसमे उनसे पूछा गया की वो नरक में रहना पसंद करेंगे की स्वर्ग में ???
नेताजी ने जवाब में लिखा " वैसे तो स्वर्ग अच्छा है लेकिन वहाँ मेरी जान पहचान का कोई भी नहीं है ओर नरक में तो अपने सभी यार दोस्त है ही ओर मेरी पसंद की सभी चीज़े भी है वहाँ मौजूद है, तो इस कारण वश मैं नरक में ही रहना चाहूँगा !" ओर ये लिख कर नेताजी ने अपना फॉर्म जमा कर दिया !
नेताजी की इच्छा को माना गया ओर यमराज ने अपने यमदूत से कहा की इन्हें अगले दिन नरक में भेज दिया जाए ! नेताजी ये सुन कर बड़े खुश हुए !
अगले दिन नेताजी को यमदूत ने फिर से लिफ्ट में बैठाया ओर चल दिए नरक की ओर ! लिफ्ट धीरे-धीरे ऊपर जाने लगी ओर नेताजी की ख़ुशी तेजी से बदती गई ! थोड़ी देर बाद नरक आ गया ओर नेताजी को वहाँ छोड़ा गया ! लेकिन ये क्या नेताजी को तो अचानक गुस्सा आ गया ! उन्हें नरक में ना तो वो गोल्फ कोर्स दिखा ओर ना बीअर बार और ना ही अपने वो सभी दोस्त ! बल्कि आज तो नरक में चारो तरफ गंदगी फैली हुई थी ओर वहाँ सभी लोगो की काम ना करने के कारण पिटाई भी लगाई जा रही थी ! ये देख कर नेताजी घबरा गए ! उन्होंने यमदूत से पूछा, ये सब क्या है ???? कल तो यहाँ बढ ही सुन्दर नज़ारा था ओर आज ये सब क्यों ????
तब यमदूत ने बड़े प्यार से बोला "वो क्या है ना नेताजी कल स्वर्ग ओर नरक के इलेक्शन थे ओर हमें आपका वोट चाहिए था, बस इसलिए ही आपको वो सब्जबाग दिखाया गया था ! अब आप यही रहिये !"
भगवान् नेताजी की आत्मा को शांति दे !!!!!!!
शनिवार, जून 05, 2010
अजी छोड़िए ये मजाक .......
आज विश्व पर्यावरण दिवस है सभी जानते होंगे ! प्रतिवर्ष 5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस ! अच्छा है, वैसे भी ये तो आजकल का चलन बन गया है किसी को साल में एक दिन याद करके बाकि दिन भूल जाने का ! फिर चाहे विश्व पर्यावरण दिवस हो, अर्थ अवर डे, या फिर कोई और दिन !
अब आज सब बैठ गए सुबह से इस मुद्दे पर अपने-अपने विचार देने और लगे हाथ मैं भी आ गई इस पर अपना teekha bol सुनाने !
तो सुनिए, अब तक सभी ने यही कहा और सुना होगा की आज के दिन हमें ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने चाहिए या फिर अपने आस पास के पेड़ो को कैसे बचाना चाहिये ! और सही भी है अगर हम इन पेड़ो की रखवाली नहीं करेंगे या इन्हें सही तरीके से सीचेंगे नहीं तो ये हमारा साथ नहीं देंगे ! लेकिन क्या सिर्फ खाद पानी दे देने भर से इनकी देखभाल हो जाती है या सिर्फ नए पेड़ लगाने भर से ही हम अपने पर्यावरण को बचा लेंगे !
कुछ आंकड़े बताती हूँ जो अभी कुछ दिन पहले एक विद्यार्थी की साइंस की और सामान्य ज्ञान की किताब में पढे थे !
कोई भी एक बड़ा वृक्ष अपने पूरे जीवन में एक टन कार्बन डाई ऑकसाइड सोखता है ! अब ज़रा गौर करिए अगर एक वृक्ष एक टन कार्बन डाई ऑकसाइड अपने जीवन में सोख रहा है तो हम अपनी तरफ से जो कार्बन डाई ऑकसाइड पर्यावरण को तोहफे में दे रहे उसको सोखने के लिए कितने वृक्षों ज़रूरत होगी ! लम्बा हिसाब है !
हम अक्सर चिल्लाते है गर्मी है गर्मी है, कभी पर्यावरण के चिल्लाने की आवाज़ सुनी है ???? कभी सुना है धरती माँ को ये कहते की बस करो अब और नहीं सह सकती ! कभी पेड़ो को चिल्लाते सुना है ??? मत काटो हमें ! कभी सुना है अपने आस-पास के परिंदों को चिल्लाते,मत उजाडो हमारे घर ! कभी सुना है जलीय जीव को चिल्लाते मत करो मेरा घर गन्दा ! शायद सुना हो या नहीं भी सुना हो लेकिन सुन कर भी क्या फायदा,हम तो वैसे भी अक्सर पीडितो की आवाज़ अपने लाभ के लिए अनसुनी कर ही देते है !
भारतीय पर्यावरणविद सुन्दर लाल बहुगुणा ने कहा था "एक पेड़ दस बेटो के बराबर होता है, क्योकि ये हमें दस चीज़े देता है , ऑक्सीजन,पानी,कपडा,दवाई,एनर्जी,फूल,छाया,लकड़ी,अन्न,फल,अन्य खाद्य पदार्थ !"
अब आप ही सोचिये कि सिर्फ एक दिन हम अपने पर्यावरण को याद करके कौन सा मजाक कर रहे है ?????
अब आज सब बैठ गए सुबह से इस मुद्दे पर अपने-अपने विचार देने और लगे हाथ मैं भी आ गई इस पर अपना teekha bol सुनाने !
तो सुनिए, अब तक सभी ने यही कहा और सुना होगा की आज के दिन हमें ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने चाहिए या फिर अपने आस पास के पेड़ो को कैसे बचाना चाहिये ! और सही भी है अगर हम इन पेड़ो की रखवाली नहीं करेंगे या इन्हें सही तरीके से सीचेंगे नहीं तो ये हमारा साथ नहीं देंगे ! लेकिन क्या सिर्फ खाद पानी दे देने भर से इनकी देखभाल हो जाती है या सिर्फ नए पेड़ लगाने भर से ही हम अपने पर्यावरण को बचा लेंगे !
कुछ आंकड़े बताती हूँ जो अभी कुछ दिन पहले एक विद्यार्थी की साइंस की और सामान्य ज्ञान की किताब में पढे थे !
- एक एयर कंडिशनर एक घंटे में 3 kg कार्बन डाई ऑकसाइड उत्पन्न करता है !
- एक गीजर एक घंटे में 3.3 kg कार्बन डाई ऑकसाइड उत्पन्न करता है !
- पूरा विश्व एक दिन 80 मिलियन बैरल तेल खर्च करता है ! ( वाहनों पर )
- अब तक 200 मिलियन हेक्टयर जंगल प्रथ्वी पर से नष्ट हो चुके है !
- तंजानिया में माउन्ट किलिमंजारो 1912 से अब तक 80 % पिघल चुका है और सन 2020 में ये पूरी तरह समाप्त हो जायेगा !
कोई भी एक बड़ा वृक्ष अपने पूरे जीवन में एक टन कार्बन डाई ऑकसाइड सोखता है ! अब ज़रा गौर करिए अगर एक वृक्ष एक टन कार्बन डाई ऑकसाइड अपने जीवन में सोख रहा है तो हम अपनी तरफ से जो कार्बन डाई ऑकसाइड पर्यावरण को तोहफे में दे रहे उसको सोखने के लिए कितने वृक्षों ज़रूरत होगी ! लम्बा हिसाब है !
हम अक्सर चिल्लाते है गर्मी है गर्मी है, कभी पर्यावरण के चिल्लाने की आवाज़ सुनी है ???? कभी सुना है धरती माँ को ये कहते की बस करो अब और नहीं सह सकती ! कभी पेड़ो को चिल्लाते सुना है ??? मत काटो हमें ! कभी सुना है अपने आस-पास के परिंदों को चिल्लाते,मत उजाडो हमारे घर ! कभी सुना है जलीय जीव को चिल्लाते मत करो मेरा घर गन्दा ! शायद सुना हो या नहीं भी सुना हो लेकिन सुन कर भी क्या फायदा,हम तो वैसे भी अक्सर पीडितो की आवाज़ अपने लाभ के लिए अनसुनी कर ही देते है !
भारतीय पर्यावरणविद सुन्दर लाल बहुगुणा ने कहा था "एक पेड़ दस बेटो के बराबर होता है, क्योकि ये हमें दस चीज़े देता है , ऑक्सीजन,पानी,कपडा,दवाई,एनर्जी,फूल,छाया,लकड़ी,अन्न,फल,अन्य खाद्य पदार्थ !"
अब आप ही सोचिये कि सिर्फ एक दिन हम अपने पर्यावरण को याद करके कौन सा मजाक कर रहे है ?????
सोमवार, मई 31, 2010
क्यों ना देखू पायरेट फिल्म ?????
कल ही कि बात है, सोचा कि दीदी घर आई हुई है चलो कोई फिल्म देख कर आते है, जब ये बात दीदी को बोली तो उन्होंने कहा कि "कोई ऐसी फिल्म रिलीज़ हुई है जिस पर छ-सात सौ रुपए खर्च किए जा सके ???" सच कहू तो उस वक़्त मैं चुप हो गई ! वैसे भी इस मामले में अक्सर दीदी से डांट पड़ जाती है ! वैसे भी अब तक जितनी भी फिल्मे किसी मल्टीप्लेक्स पर जा कर देखी है उन सभी में से कुछ को छोड़ कर बाकी सभी उतने पैसे खर्च करने लायक थी नहीं ! दिल्ली में अब वैसे भी सिंगल स्क्रीन थियेटर बंद होते जा रहे है और जो अब भी बाकी है उन पर अच्छी फिल्मे रिलीज़ नहीं होती ! तो बचते है मल्टीप्लेक्स ! वैसे बचते है क्या बल्कि आज यही एक ऑप्शन है ! अब अगर दो लोग भी इन मल्टीप्लेक्स पर फिल्म देखने जाये तो उनका खर्चा कितना होगा ! अगर फस्ट शो देखने जा रहे है तो
टिकेट = 150 /- रूपये (एक के लिए)
पोपकोर्न = 75 /- रूपये (एक छोटा टब)
कोल्ड ड्रिंक = 50 /- रूपये एक गिलास ( कही-कही मूल्य ज्यादा भी होता है )
और अगर पानी की प्यास लगी तो आपको पानी भी यही से खरीदना पड़ेगा क्योकि पानी की बोतल ले जाना मना होता है !
आने-जाने का खर्चा अलग ( अब तो पेट्रोल भी महंगा हो गया है )
अगर इस खर्च को जोड़ा जाये तो 150 +75 +50 = 275 /- रूपये ये एक का खर्चा होगा
और दोनों का खर्चा होगा 275 +275 = 550 /- रुपए
अब अगर ये 550 /- रुपए किसी अच्छी फिल्म पर खर्च किए जाये तो हम खुश हो कर यही कहते है कि पैसे वसूल हो गए लेकिन अगर इतने ही पैसे कुछ ऐसी फिल्मो पर खर्च किए जाये जो देखने लायक ही ना हो तो ??? तो मैं तो यही कहती हूँ "मेहनत कि कमाई पानी में बह गई !"
जब भी कोई फिल्म रिलीज़ होती है तो उस फिल्म के निर्माता-निर्देशक सभी से यही कहते है कि हमारी फिल्म सबसे अलग है और आप सभी लोग इन्हें थियेटर में जा कर देखे ! वाकई कई फिल्म इतनी अलग होती है कि वो या तो किसी दूसरे गृह के प्राणियों को दिखाने के लिए बनाई गई हो या फिर किसी को थर्ड डिग्री देने के लिए ! ऐसी फिल्मो पर पैसे खर्च करने से तो यही अच्छा है कि मैं पायरेट फिल्म देखू या इन्हें सीधे इंटरनेट से ही डाऊनलोड कर लूँ ! हालाँकि ये दोनों ही तरीके गैरकानूनी है ! लेकिन इस तरह इन बे सिर पैर कि फिल्मो पर खर्च की जाने वाली हमारी मेहनत की कमाई तो बच ही सकेगी, क्योकि वैसे भी हमारे बोलीवुड के ज़्यादातर निर्माता-निर्देशकों की फिल्मे या तो होलीवुड से प्रेरित होती है या फिर किसी भुतिया कहानी से ! वैसे इस तरह की फिल्मो को देखने के लिए या तो पैसे वापसी की गारंटी मिलनी चाहिए या फिर टिकेट के पैसे शो ख़त्म होने के बाद लिए जाए ! लेकिन ऐसा हो नहीं सकता ! इसलिए जब तक अच्छी फिल्मे नहीं बनेंगी तब तक ये पायरेटेड फिल्मो का गोरखधंधा यूही चलता रहेगा ! फिर चाहे ये निर्माता-निर्देशक कितना भी चिल्लाये, क्योकि ना तो ये टिकेट के पैसे ही कम करते है ना ही अन्य खर्चे कम करते है ! लेकिन काम के साथ सभी को मनोरंजन भी चाहिए, लेकिन ऐसे महंगे होते मनोरंजन पर कैसे खर्च किया जाये ???
टिकेट = 150 /- रूपये (एक के लिए)
पोपकोर्न = 75 /- रूपये (एक छोटा टब)
कोल्ड ड्रिंक = 50 /- रूपये एक गिलास ( कही-कही मूल्य ज्यादा भी होता है )
और अगर पानी की प्यास लगी तो आपको पानी भी यही से खरीदना पड़ेगा क्योकि पानी की बोतल ले जाना मना होता है !
आने-जाने का खर्चा अलग ( अब तो पेट्रोल भी महंगा हो गया है )
अगर इस खर्च को जोड़ा जाये तो 150 +75 +50 = 275 /- रूपये ये एक का खर्चा होगा
और दोनों का खर्चा होगा 275 +275 = 550 /- रुपए
अब अगर ये 550 /- रुपए किसी अच्छी फिल्म पर खर्च किए जाये तो हम खुश हो कर यही कहते है कि पैसे वसूल हो गए लेकिन अगर इतने ही पैसे कुछ ऐसी फिल्मो पर खर्च किए जाये जो देखने लायक ही ना हो तो ??? तो मैं तो यही कहती हूँ "मेहनत कि कमाई पानी में बह गई !"
जब भी कोई फिल्म रिलीज़ होती है तो उस फिल्म के निर्माता-निर्देशक सभी से यही कहते है कि हमारी फिल्म सबसे अलग है और आप सभी लोग इन्हें थियेटर में जा कर देखे ! वाकई कई फिल्म इतनी अलग होती है कि वो या तो किसी दूसरे गृह के प्राणियों को दिखाने के लिए बनाई गई हो या फिर किसी को थर्ड डिग्री देने के लिए ! ऐसी फिल्मो पर पैसे खर्च करने से तो यही अच्छा है कि मैं पायरेट फिल्म देखू या इन्हें सीधे इंटरनेट से ही डाऊनलोड कर लूँ ! हालाँकि ये दोनों ही तरीके गैरकानूनी है ! लेकिन इस तरह इन बे सिर पैर कि फिल्मो पर खर्च की जाने वाली हमारी मेहनत की कमाई तो बच ही सकेगी, क्योकि वैसे भी हमारे बोलीवुड के ज़्यादातर निर्माता-निर्देशकों की फिल्मे या तो होलीवुड से प्रेरित होती है या फिर किसी भुतिया कहानी से ! वैसे इस तरह की फिल्मो को देखने के लिए या तो पैसे वापसी की गारंटी मिलनी चाहिए या फिर टिकेट के पैसे शो ख़त्म होने के बाद लिए जाए ! लेकिन ऐसा हो नहीं सकता ! इसलिए जब तक अच्छी फिल्मे नहीं बनेंगी तब तक ये पायरेटेड फिल्मो का गोरखधंधा यूही चलता रहेगा ! फिर चाहे ये निर्माता-निर्देशक कितना भी चिल्लाये, क्योकि ना तो ये टिकेट के पैसे ही कम करते है ना ही अन्य खर्चे कम करते है ! लेकिन काम के साथ सभी को मनोरंजन भी चाहिए, लेकिन ऐसे महंगे होते मनोरंजन पर कैसे खर्च किया जाये ???
मंगलवार, मई 25, 2010
क्यों जीए 150 -200 साल ????
अभी कुछ दिन पहले किसी न्यूज़ चैनल पर बाबा रामदेव ने ये घोषणा की है, कि वो आयुर्वेद और योग के सहारे 150 से 200 वर्ष तक जिन्दा रह सकते है, और अगर जलवायु और वातावरण स्वच्छ हो तब तो वो 400 वर्ष तक जिन्दा रह सकते है !
अब ये घोषणा बाबा रामदेव ने की है तो कुछ तो सच होगी ही (अब यूही तो उन्हें "योग गुरु बाबा रामदेव" कहा नहीं जाता) या हो सकता है सच ना भी हो, हाँ, लेकिन आयुर्वेद और योग के सहारे 100 वर्षो तक तो जीया जा सकता है ! इतना भरोसा तो मुझे भी आयुर्वेद और योग पर है ही ! लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है ???
अगर इसे दूसरे तरीके से समझा जाए तो मेरे विचार से तो, ऐसा नहीं हो सकता ! कोई भी अपनी म्रत्यु पर विजय नहीं पा सकता ! इंसान योग और आयुर्वेद की ताकत से अपने शारीर को अंदरूनी बीमारियों से तो बचा सकता है लेकिन बाहरी बीमारियों का क्या ?? जो आए दिन इंसानों पर अपना असर दिखाती रहती है !
बाबा रामदेव की इस घोषणा के अलावा आपने एक और खबर सुनी होगी, अभी आंध्र प्रदेश और तमिल नाडू में भयानक तूफ़ान आया "लैला", ये तूफ़ान ना जाने कितनी ही जिंदगिया लील गया ! इसके अलावा मेंगलोर में अभी एक हवाई हादसा भी हुआ जिसमे 150 से अधिक जिन्दगिया खाक हुई और इनके अलावा और ना जाने कितने ही हादसे रोज़ होते रहते है जिसमे कितनो कि जाने जाती रहती है !
अब अगर इन तीनो खबरों पर गौर किया जाए तो कोई भी बाबा रामदेव द्वारा की गई घोषणा को सिरे से नकार सकता है, और नकारे भी क्यों ना, आखिर इन दोनों हादसों और इन जैसे अनेक हादसों को देख कर तो यही साबित होता है कि कोई भी अपनी जिंदगी की गारंटी नहीं ले सकता !
लेकिन अगर कुछ देर के लिए हम ये मान भी ले की हमारे साथ ऐसा कोई हादसा नहीं होगा और हम अपनी जिंदगी कि गारंटी ले सकते है, (हालांकि ऐसा हो नहीं सकता, यहाँ तो अगले मिनट कि का पता नहीं कि क्या हो जाए ) तो क्या फिर भी हम 150 से 200 वर्ष जीना चाहेंगे ??? अब योग गुरु बाबा रामदेव इतने वर्ष जीए तो बात समझ में आती भी है आखिर उनके इतने चाहने वाले है उनके योग शिक्षा और उनके आयुर्वैदिक ज्ञान से से ना सिर्फ हमारे देश को बल्कि अब तो दुनिया को भी लाभ हो रहा है और इसलिए उन्हें तो 200 तो क्या 400 वर्ष भी जीना चाहिए ! लेकिन एक साधारण व्यक्ति क्या इतने वर्षो तक जीना चाहेगा ??? अब अगर मैं किसी और कि बात ना करके अपनी ही बात करू तो मैं तो शायद इतने वर्ष नहीं जीना चाहूंगी लेकिन ऐसा हो भी सकता है, अगर मेरे साथ-साथ मेरा परिवार, मेरे मित्र, मेरे जीवन से जुदा हर सदस्य और सबसे ज्यादा तो मेरे लेखो को पदने वाला हर इंसान भी अगर 150 से 200 वर्ष जीए तो शायद ऐसा हो सकता है !!!!!!
अब ये घोषणा बाबा रामदेव ने की है तो कुछ तो सच होगी ही (अब यूही तो उन्हें "योग गुरु बाबा रामदेव" कहा नहीं जाता) या हो सकता है सच ना भी हो, हाँ, लेकिन आयुर्वेद और योग के सहारे 100 वर्षो तक तो जीया जा सकता है ! इतना भरोसा तो मुझे भी आयुर्वेद और योग पर है ही ! लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है ???
अगर इसे दूसरे तरीके से समझा जाए तो मेरे विचार से तो, ऐसा नहीं हो सकता ! कोई भी अपनी म्रत्यु पर विजय नहीं पा सकता ! इंसान योग और आयुर्वेद की ताकत से अपने शारीर को अंदरूनी बीमारियों से तो बचा सकता है लेकिन बाहरी बीमारियों का क्या ?? जो आए दिन इंसानों पर अपना असर दिखाती रहती है !
बाबा रामदेव की इस घोषणा के अलावा आपने एक और खबर सुनी होगी, अभी आंध्र प्रदेश और तमिल नाडू में भयानक तूफ़ान आया "लैला", ये तूफ़ान ना जाने कितनी ही जिंदगिया लील गया ! इसके अलावा मेंगलोर में अभी एक हवाई हादसा भी हुआ जिसमे 150 से अधिक जिन्दगिया खाक हुई और इनके अलावा और ना जाने कितने ही हादसे रोज़ होते रहते है जिसमे कितनो कि जाने जाती रहती है !
अब अगर इन तीनो खबरों पर गौर किया जाए तो कोई भी बाबा रामदेव द्वारा की गई घोषणा को सिरे से नकार सकता है, और नकारे भी क्यों ना, आखिर इन दोनों हादसों और इन जैसे अनेक हादसों को देख कर तो यही साबित होता है कि कोई भी अपनी जिंदगी की गारंटी नहीं ले सकता !
लेकिन अगर कुछ देर के लिए हम ये मान भी ले की हमारे साथ ऐसा कोई हादसा नहीं होगा और हम अपनी जिंदगी कि गारंटी ले सकते है, (हालांकि ऐसा हो नहीं सकता, यहाँ तो अगले मिनट कि का पता नहीं कि क्या हो जाए ) तो क्या फिर भी हम 150 से 200 वर्ष जीना चाहेंगे ??? अब योग गुरु बाबा रामदेव इतने वर्ष जीए तो बात समझ में आती भी है आखिर उनके इतने चाहने वाले है उनके योग शिक्षा और उनके आयुर्वैदिक ज्ञान से से ना सिर्फ हमारे देश को बल्कि अब तो दुनिया को भी लाभ हो रहा है और इसलिए उन्हें तो 200 तो क्या 400 वर्ष भी जीना चाहिए ! लेकिन एक साधारण व्यक्ति क्या इतने वर्षो तक जीना चाहेगा ??? अब अगर मैं किसी और कि बात ना करके अपनी ही बात करू तो मैं तो शायद इतने वर्ष नहीं जीना चाहूंगी लेकिन ऐसा हो भी सकता है, अगर मेरे साथ-साथ मेरा परिवार, मेरे मित्र, मेरे जीवन से जुदा हर सदस्य और सबसे ज्यादा तो मेरे लेखो को पदने वाला हर इंसान भी अगर 150 से 200 वर्ष जीए तो शायद ऐसा हो सकता है !!!!!!
गुरुवार, मई 20, 2010
सोशल नेटवर्किंग साईट, फायदे का सौदा !!!!!
सोशल नेटवर्किंग साईट, एक ऐसा माध्यम जहां अनजाने भी अपने बन जाते है, और जहां जा कर कई बार हमारे अपने ही हमारे अनजाने बन जाते है ! ऐसा इसलिए क्योकि कई बार हम इन सोशल नेटवर्किंग साईट पर इतना वक़्त बिताते है कि हमें हमारे अपने नज़र ही नहीं आते ! ये साईट एक ऐसा जाल है जिसमे एक बार प्रवेश करने के बाद निकलना किसी को भी अच्छा नहीं लगता, और कुछ समय पहले तक तो ये सिर्फ आम लोगो में प्रचलित थी पर अब धीरे-धीरे ये आम लोगो से निकल कर खास लोगो के बीच प्रचलित होने लगी है और इसके कई उधाहरण रोज़ देखने को मिल रहे है ! अभी कुछ ही दिन पहले कि बात है जब अमिताभ बच्चन जी ने ट्विटर ज्वाइन किया उससे पहले सचिन तेंदुलकर ने ! दोनों ने ही पहले ही दिन अपने कई फोलोअर बना लिए ! लेकिन इन सबसे भी बड़ी बात ये है कि अब आपकी और हमारी दिल्ली ट्रेफिक पुलिस भी ट्विटर और फेसबुक से जुड़ गई है ! जो हर पल कि ट्रेफिक अपडेट आपको देती रहती है, कहाँ जाम लगा है , कहाँ बस पलटी है, कहाँ ट्रेफिक डायवर्ट किया गया है , वगेरह-वगेरह ! हालाँकि उनकी ये सारी कसरत कॉमन वेल्थ गेम के लिए है लेकिन फिर भी लोगो को दिल्ली ट्रेफिक पुलिस से सीधे जुड़ने का ये तरीका बड़ा पसंद आ रहा है ! सभी अपनी परेशानियों का सीधे-सीधे हल दूंद रहे है ! किसी को जानना है की वो अपनी गाड़ी के शिशो पर कितने mm की फिल्म चद्वाए तो किसी को जानना है की वो आज किस रास्ते ना गुजरे सभी के जवाब भी कुछ ही देर में मिल रहे है ! लेकिन बेचारी दिल्ली ट्रेफिक पुलिस उसे ये पता नही की उसने किस ओखली में सर दिया है और शायद यही बताने के लिए दिल्ली के कुछ समझदार लोग भी है जो ये जानना चाह रहे ही अगर उन्होंने हेलमेट नहीं पहना तो "मामा जी" कितने में मानेंगे ! हालाँकि इसका कोई जवाब नहीं मिला जबकि जवाब तो इसका भी मिलना चाहिए था ! लगे हाथ मैंने भी पूछ डाला की क्या मैं यहाँ उन "मामो " के नाम ले सकती हूँ जिन्होंने बिना वजह हम लोगो से चदावा लिया ! लेकिन इसका भी जवाब नहीं मिला बल्कि कुछ देर बाद देखा तो ये दोनों और इन जैसे और कमेन्ट डिलीट किए जा चुके थे ! ऐसी उमीद तो नहीं थी लेकिन हुआ ऐसा ही !
लेकिन अगर दिल्ली ट्रेफिक पुलिस खुद को मिलने वाले सभी कमेन्ट को गभीरता से तो कॉमन वेल्थ गेम तक पूरी व्यवस्था ही सुधर जाएगी, लेकिन ये " दिल्ली ट्रेफिक पुलिस" है जो हमेशा हमारे साथ रहने के स्लोगन तो लिख सकती है पर उसे निभा नहीं सकती !
खैर ये बात तो रही दिल्ली ट्रैक पुलिस की, लेकिन अगर सोच कर देखा जाए तो इस तरह की शुरुवात अगर सभी सरकारी विभाग कर दे तो हमारी सरकारी व्यवस्था काफी हद तक सुधर सकती है ! लोग सीधे तौर पर अपनी शिकायते सम्बंधित विभाग के पास पंहुचा सकते है ! जिसका सीधा लाभ लोगो तक पहुच सकेगा और तब शायद ये भ्रष्ट होती सरकार कुछ हद तक सुधर सके ! आज तरह-तरह लोग इन साइट्स से जुड़ कर सीधे लोगो से संपर्क साध रहे है ! अभी कुछ दिन पहले ही बाबा राम देव के राजनीति में आने की चर्चा के बाद बाबा रामदेव को लेकर कई तरह की बाते की जाने लगी कई तरह के प्रश्न किए जाने लगे और उन सभी प्रश्नों का जवाब बाबा रामदेव ने प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के साथ-साथ सीधे ही अपने सोशल नेटवर्किंग अकाउंट पर देना शुरू किया ! जिससे लोगो को उन्हें सीधे तौर पर समझने में मदद मिली ! अगर ऐसी ही पहल आज हर राजनितिक पार्टी कर दे तो पार्टी के आलाकमान को अपने ही कार्य्कर्तऔ के उलजलूल बयानों और उटपटांग हरकतों की वजह से शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा ! और इससे सीधे-सीधे उस पार्टी को यह भी पता चल जायेगा की किस जगह उसकी पार्टी कितनी प्रगति कर रही है ! तब कोई भी पार्टी यह नहीं कह सकेगी की वो काम तो कर रही लेकिन कुछ लोगो की वजह से उनका किया काम सफल नहीं हो पा रहा !
शशि थरूर के मामले में अभी पिछले दिनों जो भी हुआ वो सभी ने देखा और उस पूरे मामले में ट्विटर ने एक अहम् भूमिका निभाई ! बेशक ललित मोदी की एक ट्विट ने पूरा हंगामा खड़ा किया लेकिन उस एक ट्विट से काफी बड़ा खुलासा हो गया ! जो शायद नहीं हो पता अगर दोनों ही दिग्गज उस सोशल नेटवर्किंग साईट से ना जुड़े होते ! हालाँकि इस मामले के बाद सभी नेता इस तरह की साईट से तौबा कर चुके हो लेकिन मेरा तो मानना यही है की हमारे सभी राजनेताओ को इस तरह की सोशल नेटवर्किंग साईट से जुड़ना चाहिए ! ताकि लोग तब सीधे ही उनसे सवाल जवाब कर सके !
अगर ऐसा होता है तो ये आने वाले समय में हमारे देश के लिए बहुत ही अच्छा प्रयोग होगा जिससे ना सिर्फ देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल सकेगी बल्कि आम जानता भी सही मायनो में अपने चहेतों को परख भी सकेगी !
लेकिन अगर दिल्ली ट्रेफिक पुलिस खुद को मिलने वाले सभी कमेन्ट को गभीरता से तो कॉमन वेल्थ गेम तक पूरी व्यवस्था ही सुधर जाएगी, लेकिन ये " दिल्ली ट्रेफिक पुलिस" है जो हमेशा हमारे साथ रहने के स्लोगन तो लिख सकती है पर उसे निभा नहीं सकती !
खैर ये बात तो रही दिल्ली ट्रैक पुलिस की, लेकिन अगर सोच कर देखा जाए तो इस तरह की शुरुवात अगर सभी सरकारी विभाग कर दे तो हमारी सरकारी व्यवस्था काफी हद तक सुधर सकती है ! लोग सीधे तौर पर अपनी शिकायते सम्बंधित विभाग के पास पंहुचा सकते है ! जिसका सीधा लाभ लोगो तक पहुच सकेगा और तब शायद ये भ्रष्ट होती सरकार कुछ हद तक सुधर सके ! आज तरह-तरह लोग इन साइट्स से जुड़ कर सीधे लोगो से संपर्क साध रहे है ! अभी कुछ दिन पहले ही बाबा राम देव के राजनीति में आने की चर्चा के बाद बाबा रामदेव को लेकर कई तरह की बाते की जाने लगी कई तरह के प्रश्न किए जाने लगे और उन सभी प्रश्नों का जवाब बाबा रामदेव ने प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के साथ-साथ सीधे ही अपने सोशल नेटवर्किंग अकाउंट पर देना शुरू किया ! जिससे लोगो को उन्हें सीधे तौर पर समझने में मदद मिली ! अगर ऐसी ही पहल आज हर राजनितिक पार्टी कर दे तो पार्टी के आलाकमान को अपने ही कार्य्कर्तऔ के उलजलूल बयानों और उटपटांग हरकतों की वजह से शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा ! और इससे सीधे-सीधे उस पार्टी को यह भी पता चल जायेगा की किस जगह उसकी पार्टी कितनी प्रगति कर रही है ! तब कोई भी पार्टी यह नहीं कह सकेगी की वो काम तो कर रही लेकिन कुछ लोगो की वजह से उनका किया काम सफल नहीं हो पा रहा !
शशि थरूर के मामले में अभी पिछले दिनों जो भी हुआ वो सभी ने देखा और उस पूरे मामले में ट्विटर ने एक अहम् भूमिका निभाई ! बेशक ललित मोदी की एक ट्विट ने पूरा हंगामा खड़ा किया लेकिन उस एक ट्विट से काफी बड़ा खुलासा हो गया ! जो शायद नहीं हो पता अगर दोनों ही दिग्गज उस सोशल नेटवर्किंग साईट से ना जुड़े होते ! हालाँकि इस मामले के बाद सभी नेता इस तरह की साईट से तौबा कर चुके हो लेकिन मेरा तो मानना यही है की हमारे सभी राजनेताओ को इस तरह की सोशल नेटवर्किंग साईट से जुड़ना चाहिए ! ताकि लोग तब सीधे ही उनसे सवाल जवाब कर सके !
अगर ऐसा होता है तो ये आने वाले समय में हमारे देश के लिए बहुत ही अच्छा प्रयोग होगा जिससे ना सिर्फ देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल सकेगी बल्कि आम जानता भी सही मायनो में अपने चहेतों को परख भी सकेगी !
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